भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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१२ प्रशस्तपादभाष्यम् अण्डज हैं । स्वेदज और उद्भिज्जादि के शरी अयोनिज हैं । स्वेदज हैं कृमि प्रभृति और उद्भिज्ज हैं वृक्षादि । नारकीय शरीर भी अयोनिज ही हैं । जल रूप समवायिकारण और शेष चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर जलीय शरीर है, जो 'वरुणलोक' में प्रसिद्ध है । तेज रूप समवायिकारण औरशेष चार भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से उत्पन्न शरीर 'तैजस शरीर' कहलाता है, जो 'सूर्यलोक' में प्रसिद्ध है । वायु रूप समवायिकारण और शेष चारों भूत द्रव्य रूप निमित्तकारणों से जिस शरीर का निर्माण होता है, वह वायवीय शरीर कहलाता है । पिशाचादि का शरी वायवीय शरीर है । घ्राण, रसना, चक्षु, त्वचा, श्रौत्र औरम न ये छः ईन्द्रियाँ हैं । हाथ, पैर प्रभृति शरीर के अवयव मात्र हैं, इन्द्रिय नहीं । इनमें श्रोत्र आकाश रूप है, अतः नित्य है । और मन परमाणु रूप है, अतः नित्य है । चक्षुरादि शेष चार इन्द्रियाँ क्रमशः पृथिवी, जल, तेज और वायु रूप द्रव्य से उत्पन्न होती हैं । इनमें घ्राण पार्थिव हैं, रसना जलीय है, चक्षु तैजस है और त्वचा वायवीय है । फलतः घ्राण पृथिवी है, रसना जल है, चक्षु तेज है और त्वचा वायु है । इस प्रकार घ्राण प्रभृति चार इन्द्रियाँ पृथिवी प्रभृति चार भूतों से उत्पन्न होने के कारण 'भौतिक' हैं । श्रवणेन्द्रिय आकाश रूप है आकाश से उत्पन्न नहीं; क्योंकि आकाश नित्य है । नित्य द्रव्य किसी द्रव्य का समवायिकारण नहीं हो सकता, अतः 'श्रवणेन्द्रिय' स्वयं भूत-द्रव्य होने के कारण ही 'भौतिक' कहलाता है । मन भौतिक नहीं है । मिट्टी प्रभृति 'विषय' रूप पृथिवी हैं, सरिता, समुद्रादि 'विषय' रूप जल हैं । वह्नि एवं सुवर्णादि 'विषय' रूप तेज हैं । जिससे आँधी प्रभृति होती हैं, वे सभी वायु विषय रूप हैं । शरीरादि तीनों प्रकारों से भिन्न वायु का 'प्राण' नाम का चौथा प्रकार भी है । शरीर के भीतर चलनेवाली वायु को 'प्राण' कहते हैं; किन्तु कार्य-भेद से और स्थान-भेद से उसके प्राण, अपान, समान और व्यान ये चार नाम प्रसिद्ध हैं । शाखादि के कम्प से वायु का केवल अनुमान ही होता है, प्रत्यक्ष नहीं; क्योंकि रूपी द्रव्य का ही प्रत्यक्ष होता है । किसी का मत है कि वायु का भी स्पार्शनप्रत्यक्ष होता है । द्रव्य के चाक्षुषप्रत्यक्ष के लिए ही द्रव्य में रूप का रहना आवश्यक है । नित्य द्रव्यों में पृथिव्यादि चारों प्रकार के परमाणुओं का उल्लेख कर चुके हैं । वैशेषिकों का कहना है कि घटादि कार्यद्रव्यों का नाश प्रत्यक्षसिद्ध है । विनाश की परम्परा का विश्राम कहीं पर मानना आवश्यक है । ऐसा न मानने पर राई और पर्वत दोनों को एक परिमाण का मानना पड़ेगा; क्योंकि राई का विनाश भी अनन्त खण्डों में होगा और पहाड़ का भी विनाश अनन्त खण्डों में होगा । अतः दोनों अनन्त खण्डों से निर्मित होने कारण समान परिमाण के होंगे; किन्तु यह