भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २२३ प्रशस्तपादभाष्यम् मप्यत एव । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । अपसर्पणोपसर्पणवचनात्संयोग- होती है। "तदभाववचनादणु मनः" (७/१/२२) सूत्रकार की इस उक्ति से मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है। अपसर्पणोपसर्पण 'वचन से अर्थात् 'अपसर्पण- मुपसर्पणमाशितपीतसंयोगवत् कायान्तरसंयोगश्चादृष्टकारितानि' (५/२/१७) न्यायकन्दली प्रेरणधारणे च प्रयत्नविशेषादेकस्मादेव भवतः, यधानेकविषयमेकं ज्ञानं तथा तत्कारणा- विच्छाप्रयत्नावपीति न किञ्चिद् दुरुपपादम् । पृथक्त्वमप्यत एवेति । सङ्ख्यानुविधानादेव पृथक्त्वमपि सिद्धमित्यर्थः । तदभाववचनादणुपरिमाणम् । विभववान्महानाकाशस्तथा चात्मेत्यभिधाय तदभावादणु मन इत्युक्तम् । तस्मादणुपरिमाणं मन इति सिद्धम् । नित्यद्रव्यगतस्य विभवाभावस्य अणुपरिमाणत्वाव्यभिचारात् । विभवाभावश्चास्य युगपज्ज्ञानानुपपत्तैव समधिगतः । मनसो विभुत्वे युगपत्समस्तेन्द्रियसम्बन्धाच्चक्षु- रादिसन्निकृष्टेषु रूपादिषु ज्ञानयौगपद्यं स्यात् । अथ कथमेकेन्द्रियग्राह्येषु घटादिषु मनोधिष्ठितेन चक्षुषा युगपत्सन्निकृष्टेषु ज्ञानानि युगपन्न भवन्ति ? आत्मैन्द्रियार्थ- सन्निकर्षाणां यौगपद्यान्न भवन्ति । तावदनेनात्ममनः संयोगस्यैकस्य युगपदनेकस्य ज्ञानस्यो- त्पादनसामर्थ्याभावः कल्प्यत इति चेत् ? समानमेतद्विभुत्वेऽपि मानसः, तस्माद्विभुत्वेऽपि का धारण और प्रेरण दोनों ही होंगे । जैसे कि एक ही सामग्री से अनेक विषयक एक ज्ञान की उत्पत्ति होती है, वैसे ही एक ही इच्छा और प्रयत्नवाली सामग्री से धारण और प्रेरण दोनों की उत्पत्ति होगी, इसमें कुछ भी असङ्गति नहीं है । 'अत एव मन में पृथक्त्व भी है', अर्थात् चूँकि मन में संख्या है, अतः उसमें पृथक्त्व भी है । उसके 'अभाव' के कहने से मन में अणु परिमाण भी है, अर्थात् महर्षि कणाद ने विभवसूत्र के बाद कहा है कि 'तदभावादणु मनः', इसमें मन में अणु परिमाण की सिद्धि होती है । 'जो नित्य द्रव्य विभु न हो वह अवश्य ही अणु परिमाण का हो' इस नियम में कोई व्यभिचार नहीं है । एक क्षण में एक आत्मा में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं होती है, इसी से समझते हैं कि मन विभु नहीं है । अगर मन विभु हो तो फिर एक ही क्षण में अनेक इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध होने के कारण चक्षुरादि इन्द्रियों के साथ सम्बद्ध रूपादिविषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति हो जायगी । (प्र.) (हर एक शरीर में एक-एक ही मन मान लेने पर भी) एक ही इन्द्रिय से सम्बद्ध घटादिविषयक अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति क्यों नहीं होती है ? क्योंकि आत्ममनःसंयोग इन्द्रिय का मन के साथ संयोग, एवं अनेक विषयों के साथ इन्द्रिय का संयोग ये सभी तो एक ही क्षण में हैं ही । अगर यह कल्पना करें कि 'उस सामग्री को एक क्षण में एक ही ज्ञान को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है, अनेक ज्ञानों को उत्पन्न करने का नहीं, तो फिर ज्ञान-यौगपद्य