भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 192

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३७ न्यायकन्दली नियमेन तद्धर्मानुविधानात् । अतत्पूर्वकत्वे हि पटे यत्किञ्चिद् गुणान्तरं स्यान्नियम- हेतोरभावात् । एतेनैकमेव सर्वत्र शुक्लं रूपं प्रत्यभिज्ञानादिति प्रत्युक्तम् । तरतमादिभावानुप- पत्तिप्रसङ्गाच्च । तस्मात्सामान्यविषया प्रत्यभिज्ञा । पार्थिवपरमाणुरूपादयः पाकजाद्विसंयोगाज्जायन्ते न तु परमाणुसम- वायिकारणाश्रितरूपादिपूर्वकाः, अतस्तन्निवृत्यर्थमपाकजग्रहणम् । सिद्धायामुत्पत्तौ कारणगुणपूर्वकत्वमकारणगुणपूर्वकत्वं चेति निरूपणीयम् । जलादिपरमाणु- पट में ऐसे भी गुणों की उत्पत्ति हो जो तन्तुओं में न देखे जाते हों; क्योंकि 'अवयव के गुणों से ही अवयवी के गुण उत्पन्न होते हैं' इस नियम में कोई (अन्य) प्रमाण नहीं है । अगर यह नियम न हो तो फिर पट में तन्तुओं में न रहनेवाले किसी गुण की उत्पत्ति होने में भी कोई बाधा नहीं है; क्योंकि 'पट में इतने ही गुण उत्पन्न हों, इस विषय में (उक्त नियम को छोड़ कोई अन्य) कारण नहीं है । कथित युक्ति से ही किसी आचार्य का निम्नलिखित यह मत भी खण्डित हो जाता है कि (प्र.) शुक्ल रूप से युक्त जितने भी द्रव्य दीख पड़ते हैं, उन सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप है; क्योंकि (जिस शुक्ल रूप को मैंने घट में देखा था, उसी को पट में भी देख रहा हूँ यह) प्रत्यभिज्ञा होती है । (उ.) ('अवयवगत गुण ही अवयवी में गुण को उत्पन्न करते हैं' इस नियम की अनुपपत्ति रूप दोष के अतिरिक्त इस पक्ष में) यह दोष भी है कि अगर शुक्ल रूप से युक्त सभी द्रव्यों में एक ही शुक्ल रूप हो तो फिर उनमें इस न्यूनाधिकभाव की प्रतीति नहीं होगी कि 'यह इससे अधिक शुक्ल है' या 'यह इससे कम शुक्ल है', अतः कथित प्रत्यभिज्ञा केवल सादृश्य के कारण होती है (दोनों द्रव्यों में प्रतीत होने वाले शुक्ल रूपों के एकत्व से नहीं) । पार्थिव परमाणु के रूपरसादि पाक से ही उत्पन्न होते हैं, अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपरसादि से नहीं; क्योंकि उन रूपादि के आश्रयीभूत परमाणुओं का कोई समवायिकारण ही नहीं है । पार्थिव परमाणुओं के पाकजरूपादि में 'कारणगुणपूर्वकत्व' रूप साधर्म्य अव्याप्त न हो जाय, अतः (प्रकृत साधर्म्य के लक्ष्यबोधक वाक्य में) 'अपाकज' पद दिया है । उत्पत्ति की सिद्धि हो जाने पर फिर उस उत्पन्न वस्तु में ही जिज्ञासा होती है कि उसकी उत्पत्ति कारण के गुणों से होती है या और किसी से ? जलादि के परमाणुओं के रूपादि की तो उत्पत्ति ही नहीं होती (क्योंकि वे नित्य हैं), अतः उनमें कारणगुणपूर्वकत्व साधर्म्य के न होने से भी व्यभिचार दोष नहीं है । इन गुणों को 'कारणगुणपूर्वक' कहने का अभिप्राय केवल इनके स्वरूपों का कथन मात्र है ।