भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २४३ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगविभागसङ्ख्यैकपृथक्त्वगुरुत्वद्रवत्ववेगधर्माधर्मास्तूभयत्रारम्भकाः । संयोग, विभाग, संख्या, एकपृथक्त्व, गुरुत्व, द्रवत्व, वेग, धर्म और अधर्म ये नौ गुण अपने आश्रय एवं अनाश्रय दोनों प्रकार की वस्तुओं में कार्य को उत्पन्न करते हैं । न्यायकन्दली वर्त्तमाना रूपादयो यथासम्भवमवयविनि रूपादिकमारभन्ते, आत्मनि समवेतः प्रयत्नो हस्तादिषु क्रियाहेतुः । संयोगादय उभयत्रारम्भकाः । स्वाश्रये तदन्यत्र चारम्भकाः । तन्तुषु वर्त्तमानः संयोगस्तेष्वेव पटमारभते, विषयेन्द्रियसंयोगश्चात्मनि ज्ञानम् । वंशदलयोर्विभागोऽन्य- त्राकाशे शब्दमारभते, वंशदलाकाशविभागश्च स्वाश्रय आकाशे । अवयववर्त्तिन्येकत्व- सङ्ख्या अवयविन्येकत्वसङ्ख्यामारभते, स्वाश्रये च द्वित्वादिसङ्ख्याम् । अथावयवेष्वेकपृथ- कत्वमवयविन्येकपृथक्त्वं स्वाश्रयेषु त्रिपृथक्त्वादिकमिति । कारणगताश्च गुरुत्व- द्रवत्ववेगाः कार्ये तानारभन्ते, स्वाश्रयेषु क्रियाम् । धर्माधर्मावात्मनि सुखदुःखे परत्र चाग्न्यादौ ज्वलनादिक्रियाम् । आश्रय से भिन्न आश्रय में ही कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयवों में रहने वाले रूपादि यथासम्भव अवयवों में ही रूपादि को उत्पन्न करते हैं । प्रयत्न स्वयं समवाय सम्बन्ध से आत्मा में रहता है; किन्तु हाथ, पैर प्रभृति अङ्गों में क्रिया को उत्पन्न करता है । संयोगादि ये नौ गुण दोनों ही प्रकार के आश्रयों में कार्य को उत्पन्न करते हैं, अर्थात् ये अपने आश्रय और उससे भिन्न आश्रय, दोनों प्रकार के आश्रयों में कार्य के उत्पादक हैं, (जैसे कि) तन्तुओं में रहनेवाला संयोग अपने आश्रयीभूत उन तन्तुओं में ही पटरूप कार्य को उत्पन्न करता है; किन्तु विषय एवं इन्द्रिय का संयोग (अपने आश्रयीभूत इन दोनों से भिन्न) आत्मा में ज्ञान को उत्पन्न करता है । बाँस के दो दलों का विभाग (अपने आश्रयीभूत उन दो वंशदलों से भिन्न) आकाश में शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करता है; किन्तु बाँस के ही दल और आकाश का विभाग अपने आश्रयीभूत आकाश में ही शब्दरूप कार्य को उत्पन्न करते हैं । अवयव में रहनेवाली एकत्व संख्या (अपने आश्रय से भिन्न) अवयवी में एकत्व संख्या को उत्पन्न करती है एवं अपने आश्रयरूप अवयव में द्वित्वादि संख्या को भी उत्पन्न करती है । अवयवों में रहनेवाला एकपृथक्त्व अवयवी में एकपृथक्त्व को एवं अपने आश्रय में त्रिपृथक्त्वादि को भी उत्पन्न करता है । इसी प्रकार कारणों में रहनेवाले गुरुत्व, द्रवत्व, वेग और स्नेह आश्रयीभूत उन कारणों के गुरुत्व, द्रवत्व, वेग एवं स्नेहरूप कार्यों को उत्पन्न करते हैं; किन्तु अपने आश्रय

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