वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका १५ पाटलिपुत्र से काशी की अपेक्षा प्रयाग दूर है एवं प्रयाग की अपेक्षा पाटलिपुत्र से काशी समीप है-इस दूरत्व और समीपत्व की प्रतीति के लिए 'दिक्' नाम का एक द्रव्य माना जाता है । इसी कारण उक्त प्रतीतियाँ होती हैं । यह भी एक ही है और नित्य भी है । पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, उत्तर प्रभृति के जो विभिन्न व्यवहार होते हैं वे सभी उपाधिमूलक हैं । अगर दिशा के प्राच्यादि भेद वास्तविक होते, तो पूर्व में सदा पूर्वत्व का ही व्यवहार होता और पश्चिम में सदा पश्चिमत्व का ही । किन्तु सो नहीं होता, क्योंकि जिसमें एक की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है, उसी में उससे भी पूर्व में रहनेवाले की अपेक्षा पश्चिमत्व का व्यवहार होता है । इसी प्रकार पश्चिम में भी किसी पश्चिमेतर की अपेक्षा पूर्वत्व का व्यवहार होता है, अतः दिशा के पूर्व-पश्चिमादि भेद औपाधिक हैं, वास्तविक नहीं । अतः दिक् भी एक ही है । 'अहं सुखी, अहं दुःखी, अहं जानामि' इत्यादि प्रत्यक्षात्मक प्रतीति सार्वजनीन है । इन प्रत्यक्षों के द्वारा ही सुखदुःखादि के आश्रय रूप आत्मा की सिद्धि होती है, फिर भी सुखदुःखादि के आश्रय शरीर या इन्द्रिय अथवा मन क्यों नहीं हैं ? ये प्रश्न रह जाते हैं । इन प्रश्नों के उत्तर के बिना आत्मा तत्त्वतः ज्ञात नहीं हो सकता । अतः 'शरीरादि आत्मा नहीं हैं' यह समझना आवश्यक है । शरीर को ही आत्मा माननेवालो का कहना है कि आत्मा कोई प्रत्यक्षदृष्ट वस्तु नहीं है । जो सम्प्रदाय आत्मा को स्वीकार करते हैं वे भी सुखादि प्रत्यक्ष के लिए आत्मा में शरीर का सम्बन्ध आवश्यक मानते हैं । अत एव वे शरीर को आत्मा में शरी का सम्बन्ध आवश्यक मानते हैं । अत एव वे शरीर को आत्मा के भोग का 'आयतन' कहते हैं । ऐसी स्थिति में शरीर के साथ जब सुखादि का अन्वय और व्यतिरेक सर्वसिद्ध है, अतएव शरीर को सुखादि का कारण सभी को मानना आवश्यक है । अतः शरीर का ही समवायिकारण क्यों न स्वीकार कर लें ? सुतराम् 'अहं सुखी' इत्यादि वाक्य का 'अहम्' शब्द का अर्थ शरीर ही है, फलतः शरीर ही आत्मा है । आत्मा नाम का कोई अतिरिक्त स्वतन्त्र द्रव्य नहीं है । यह पक्ष सांसारिक साधारण जनों से स्वीकृत होने के कारण अधिक सरल है । वस्तुतः हम सभी सांसारिक प्राणी शरीरात्मवादी ही हैं । इस पक्ष के अनुसार हमारे सभी व्यवहार चलते हैं । अतः इसकी विशेष रूप से समीक्षा आवश्यक है । ज्ञान ही वस्तुतः चैतन्य है । चैतन्य से युक्त वस्तु ही चेतन कहलाती है । शरीर पाञ्चभौतिक है, पाँच भूतों में से कोई भी चेतन नहीं है । फिर भी उनकी समष्टि में चैतन्य की उत्पत्ति शरीरात्मवादी इस प्रकार करते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति में जो धर्म नहीं भी रहता है, समूह में वह धर्म रह सकता है । जैसे कि मदिरा के