भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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२५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादि- प्रशस्तपादभाष्यम् पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकमाश्रयविनाशा- देव विनश्यतीति । अग्नि के संयोग से उसका विनाश होता है । जन्य द्रव्यों में उनके अवयवों में रहनेवाले रूप से यह उत्पन्न होता है एवं आश्रय के विनाश से उसका विनाश होता है । न्यायकन्दली नित्यम् । पार्थिवपरमाणुष्वग्नि संयोगविरोधि । अग्निसंयोगो विनाशकः पार्थिवपरमाणु- रूपस्येति च वक्ष्यामः । सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम् । कार्यद्रव्यगतं रूपं स्वाश्रय- समवायिकारणरूपपूर्वकम् । आश्रयविनाशादेव विनश्यति । कार्यरूपविनाशस्याश्रय- विनाश एव हेतुः । आश्रयविनाशाद्रूपस्य विनाश इति न मृष्यामहे सहैव रूपद्रव्ययोर्विनाशप्रतीतेरिति चेत्, न, कारणाभावात् । मुद्गराभिघातात् तावदवयवक्रियाविभागादिक्रमेण द्रव्यारम्भकसंयोग- निवृत्तौ तदारब्धस्य द्रव्यस्य विनाशः कारणविनाशात्, तद्गतरूपविनाशे तु किं कारणम् ? यदि ह्यकारणस्याप्यवयवसंयोगस्य विनाशाद्रूपविनाशः, कपालरूपाण्यपि ततो विनश्येयु- परमाणुओं के रूप नित्य हैं । एवं 'पार्थिवपरमाणुष्वग्निसंयोगविरोधि' अर्थात् पार्थिव परमाणुओं में रहनेवाले रूपों का अग्नि के संयोग से नाश होता है, यह हम आगे कहेंगे । 'सर्वकार्यद्रव्येषु कारणगुणपूर्वकम्' अर्थात् कार्य-द्रव्यों में रहनेवाले सभी रूप अपने आश्रय के समवायिकारणों में रहनेवाले रूपों से ही उत्पन्न होते हैं। 'आश्रयविनाशादेव विनश्यति' अर्थात् उत्पन्न होनेवाले सभी रूपों का नाश अपने आश्रयों के नाश से ही होता है । (प्र.) हम यह नहीं मानते कि रूप का नाश आश्रय के नाश से होता है; क्योंकि रूप के नाश एवं उसके आश्रयीभूत द्रव्य के नाश दोनों की प्रतीति साथ ही होती है । (उ.) नहीं; क्योंकि आश्रयीभूत द्रव्य के नाश के साथ उसमें रहनेवाले रूप के नाश का कारण ही ( उस समय) नहीं है । मुद्गरादि के आघात से कार्य-द्रव्य के अवयवों में क्रिया, क्रिया से अवयवों का विभाग, इस क्रम के अनुसार द्रव्य के अवयवों के उत्पादक संयोग का विनाश हो जाने पर अवयवी द्रव्य का विनाश होता है; किन्तु तद्गत रूप का विनाश किससे मानेंगे ? आश्रयीभूत द्रव्य के अवयवों का संयोग रूप का कारण नहीं है । अकारणीभूत इस संयोग के नाश को ही अगर रूपनाश का कारण मानें तो फिर उक्त संयोग के नाश से कपालादि अवयवों में रहनेवाले रूप का भी नाश मानना पड़ेगा; क्योंकि अवयवों का संयोग जैसे अवयवी के रूप का कारण नहीं है, वैसे ही कपालादिगत रूप का भी कारण नहीं है । अगर अवयवी में