वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 217, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति- प्रशस्तपादभाष्यम् न च कार्यद्रव्य एव रूपाद्युत्पत्तिर्विनाशो वा सम्भवति, सर्वावयवेष्वन्त- र्बहिश्च वर्त्तमानस्याग्निना व्याप्यभावात् । अणुप्रवेशादपि च व्याप्तिर्न सम्भवति, कार्यद्रव्यविनाशादिति । उस (कच्चे स्थूल घटादि) द्रव्यों में ही (अग्निसंयोग से पाकज) रूपादि की उत्पत्ति या (नीलादि पहले) रूपादि का विनाश नहीं हो सकता; क्योंकि बाहर और भीतर के सभी अवयव केवल बाहर में विद्यमान अग्नि के संयोग से व्याप्त नहीं हो सकते । (अग्नि के) परमाणुओं से भी उक्त व्याप्ति नहीं हो सकती; क्योंकि इसके मानने पर भी कार्य द्रव्य का नाश मानना ही पड़ेगा । न्यायकन्दली सर्वेष्ववयवेषु वर्त्तमानस्य समवेतस्यावयविनो बाह्ये वर्त्तमानेन वह्निना व्याप्ते- र्व्यापकस्य संयोगस्याभावात् कार्यरूपादीनामुत्पत्तिविनाशयोरक्लृप्तेरन्तर्वर्त्तिना- मपाकप्रसङ्गादिति भावः । सच्छिद्राण्येवावयविद्रव्याणि । तत्र यदि नाम महतस्ते- जोऽवयविनो नान्तः प्रवेशोऽस्ति, तत्परमाणूनां ततो व्याप्तिर्भविष्यति ? तत्राह- अणुप्रवेशादपीति । न तावत्परमाणवः सान्तराः, निर्भागत्वात् । द्व्यणुकस्य सान्तरत्वे चानुत्पत्तिरेव, तस्य परमाण्वोरसंयोगात् । संयुक्तौ चेदिमौ निरन्तरावेव । सभागयोर्हि अवयवों में 'वर्तमान' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले अवयवी में केवल बाहर रहनेवाले वह्नि की 'व्याप्ति' अर्थात् व्यापक संयोग (बाहर और भीतर सभी अवयवों के साथ संयोग) नहीं हो सकता । एवं कार्यद्रव्यों के रूपादि की उत्पत्ति और विनाश भी (बिना कारण के) नहीं हो सकते । (अतः आक्षेप करनेवाले के पक्ष में कथित व्यापक संयोग रूप कारण के अभाव से) भीतर के अवयवों में पाक ही उत्पन्न नहीं होगा (फलतः भीतर की तरफ घटादि कच्चे ही रह जायेंगे) । (प्र.) जितने भी अवयवी रूप द्रव्य हैं सभी छोटे-छोटे छिद्रों से युक्त हैं, उन छोटे छिद्रों के द्वारा यद्यपि बड़े तेजद्रव्य का प्रवेश सम्भव नहीं है, फिर भी तेज के परमाणुओं का प्रवेश उन छोटे छिद्रों से भी हो सकता है । इस प्रकार घट का विनाश न मानने पर भी (अवयवी के बाहर और भीतर पाक का प्रयोजक) कथित व्यापक वह्निसंयोग की उपपत्ति हो सकती है । इसी आक्षेप के समाधान में 'अणुप्रवेशादपि' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । अभिप्राय यह है कि परमाणुओं के तो अंश हैं नहीं, जिससे कि वे छिद्रयुक्त होंगे ? द्व्यणुकों को अगर छिद्रयुक्त मानें तो फिर उनकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं