वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे रूपादीनां पाकजोत्पत्ति- न्यायकन्दली एव जायन्ते कार्यद्रव्यगतरूपादित्वात् पटगतरूपादिवत् । किञ्च, पूर्वमवयवानां प्रशिथिलता आसीदिदानीं काठिन्यमुपलभ्यते, न च नोदनाभिघातयोरिव शैथिल्यकाठिन्ययोरेकत्र समावेशो युक्तः, परस्परविरोधात् । तस्मात् पूर्वव्यूहनिवृत्तौ व्यूहान्तरमेतदुपजातम् । तथा सति प्राक्तनद्रव्यविनाशः कारणविनाशात्, द्रव्यान्तरस्योत्पादः कारणसद्भावादेवेत्यवतिष्ठते । प्रत्यभिज्ञानं च ज्वालादिवत् सामान्यविषयम् । सर्वावस्थोपलब्धिरपि कार्यस्य विनश्यतोऽपि क्रमेण विनाशात् । न हि घटः परमाणुसञ्चयारब्धो येन विभक्तेषु परमाणुषु सहसैव विनश्येत्, किन्तु द्व्यणुकादिक्रमेणारब्धः । तस्य द्व्यणुकत्र्यणुकाद्यसङ्ख्येयद्रव्यविनाशात्परम्परया चिरेण विनश्यतो यावद्विनाशास्तावदुपलब्धिरस्त्येव । एकतश्च पूर्वऽवयवा विनश्यन्ति, अन्यतश्चोत्पन्नपाकजैरणुभिरपूर्वे तत्स्थान एव द्व्यणुकादिक्रमेणारभ्यन्ते, तेन रूपादि अपने आश्रयों के नाश से ही नष्ट होते हैं । एवं जिस प्रकार पटस्वरूप कार्यद्रव्य के रूपादि अपने कारणीभूत तन्तुओं के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार घटादि सभी कार्यद्रव्यों के रूपादि अपने कारणीभूत द्रव्यों के रूपादि से ही उत्पन्न होते हैं । और भी बात है कि पाक से पहले घटादि में रहनेवाला प्रशिथिल संयोग एवं पाक के बाद होनेवाला कठिन संयोग दोनों परस्पर विरोधी हैं, नोदन-संयोग एवं अभिघात-संयोग इन दोनों की तरह वे परस्पर अविरोधी नहीं हैं, अतः एक घट में पाक से पहले का प्रशिथिल संयोग एवं पीछे का कठिन संयोग ये दोनों नहीं रह सकते । अतः यही मानना पड़ेगा कि पहले 'व्यूह' अर्थात् अवयवों के संयोग का नाश हो जाने पर अवयवों के दूसरे व्यूह (संयोग) की उत्पत्ति होती है । फलतः पहले अवयवी का नाश हो गया; क्योंकि उसके कारण अवयवों के संयोग (पूर्वव्यूह) का नाश हो गया है । दूसरे अवयवी की उत्पत्ति होती है; क्योंकि कारणीभूत दूसरे व्यूह (अवयवसंयोग) की सत्ता है । पकने के बाद भी 'यह वही घट है' इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा तो दोनों में अत्यन्त सादृश्य के कारण होती है, जैसे कि दीपादि की ज्वालाओं में इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञायें होती हैं । घटादि की सभी अवस्थाओं की उक्त उपलब्धि में यह युक्ति है कि (पाक से) घटादि द्रव्यों का विनाश क्रमशः होता है । परमाणुओं के समूहों से ही तो घट उत्पन्न होते नहीं कि उनमें परस्पर विभागों के उत्पन्न होते ही उनका सहसा नाश हो जाय । द्व्यणुकादि क्रम से उनकी उत्पत्ति होती है, अतः द्व्यणुक, त्र्यस- रेणु प्रभृति के नाश की असंख्य परम्परा से बहुत समय के बाद घटादि का नाश भी होगा, अतः जितने समय तक उनका नाश नहीं हो जाता उतने समय तक उनकी उपलब्धि होना उचित ही है। अग्नि के एक संयोग से पहले के अवयव नष्ट होते हैं एवं अग्नि के ही दूसरे संयोग से उसी स्थान पर पाकज रूपादि से युक्त अवयवों से