भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 225, कुल 759 में से

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२७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् सा पुनरेकद्रव्या चानेकद्रव्या च । तत्रैकद्रव्यायाः सलिलादिपरमाणु- रूपादीनामिव नित्यानित्यत्वनिष्पत्तयः । अनेकद्रव्या तु द्वित्वादिका परार्द्धान्ता । वह एकद्रव्य (एकद्रव्य मात्र में रहनेवाली) एवं अनेकद्रव्य (अनेक द्रव्यों में ही रहने वाली) भेद से दो प्रकार की है । इनमें एकद्रव्या संख्या के नित्यत्व और अनित्यत्व का निर्णय परमाणुरूप जल एवं कार्यरूप जल के रूपादि की तरह है । अनेकद्रव्या संख्या द्वित्व से लेकर परार्द्ध पर्यन्त है । न्यायकन्दली असति बाह्ये वस्तुनि स्वसन्तानमात्राधीनजन्मनो वासनापरिपाकस्य कादाचित्कत्यानु- पपत्तौ तन्मात्रहेतोर्नीलाद्याकारस्य कादाचित्कत्वासम्भवान्नीलादिकल्पनेति चेत्, एकद्वित्या- कारस्यापि बाह्यवस्त्वननुरोधिनो न कादाचित्कत्वमुपपद्यत इति सङ्ख्यापि कल्पनीया, उपपत्तेरुभयत्राप्यविशेषात् । यदपि द्रव्यव्यतिरिक्ता सङ्ख्या न विद्यते, भेदेनाग्रहणादित्युक्तम्, तदप्ययुक्तम्, परस्पर- प्रत्यासन्नानां वृक्षाणां दूरादेकत्वाद्यग्रहणेऽपि स्वरूपग्रहणस्य सम्भवात् । एवं रूपादि- व्यतिरेकोऽपि व्याख्यातः, दूरे रूपस्याग्रहणेऽपि द्रव्यप्रत्ययदर्शनात् । एवं सिद्धे सङ्ख्यास्वरूपे तस्या भेदं प्रतिपादयति-सा पुनरेकद्रव्या बाह्य वस्तुओं की सत्ता बिलकुल ही न मानी जाय तो अपने समुदाय मात्र से उत्पन्न होनेवाली वासना का परिपाक कभी होता है कभी नहीं, यह 'कादाचित्कत्व' असम्भव हो जायगा । एवं केवल वासना के परिपाक से ही उत्पन्न होनेवाले नीलादि का कादाचित्कत्व भी अनुपपन्न हो जायगा । अतः नीलादि की कल्पना करते हैं । (उ.) उसी प्रकार नीलादि आकारों की प्रतीति की तरह एकाकार, द्वित्वाकार, त्रित्वाकारादि प्रतीतियों की भी कादाचित्कत्व की अनुपपत्ति के कारण समान युक्ति से संख्या की कल्पना भी आवश्यक है । कोई कहते हैं कि (प्र.) द्रव्य की प्रतीति को छोड़कर अलग से संख्या की कोई प्रतीति नहीं होती, अतः द्रव्य से भिन्न संख्या नाम की कोई वस्तु नहीं है । (उ.) किन्तु यह कहना भी असत्य है; क्योंकि आपस में सटे हुए वृक्षों में संख्या का भान न होने पर भी उनके स्वरूपों (द्रव्यों) का ग्रहण होता है¹ । इस प्रकार संख्या की सिद्धि हो जाने पर 'सा पुनः' इत्यादि से इसके भेदों का १. द्रव्य और संख्या अगर अभिन्न होती तो फिर टूटे हुए वृक्षों के स्वरूप का जहाँ ग्रहण होता है वहीं वृक्ष से अभिन्न संख्या का भी ग्रहण अवश्य ही होता ।

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