भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 273

३१४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परिमाण- प्रशस्तपादभाष्यम् परिमाणं मानव्यवहारकारणम् । तच्चतुर्विधम्-अणु, महत्, दीर्घम्, ह्रस्वं चेति । तत्र महत् द्विविधम्-नित्यमनित्यं च । नित्य- मान (तौल और नाप) के व्यवहार का असाधारण कारण ही 'परि- माण' है । वह अणु, महत्, दीर्घ और ह्रस्व भेद से चार प्रकार का है । न्यायकन्दली यस्याभावात् । कारणपरिपाकस्य कादाचित्कत्वात् तत्कार्यस्य कादाचित्कत्वमिति चेत् ? कारणस्य परिपाकः कार्यः, कार्यजननं प्रत्याभिमुख्यम्, सोऽपि स्वसंवेदनमात्राधीनो न कादाचित्को भवितुमर्हति । अस्ति चायं कादाचित्कः प्रत्यक्षप्रतिभासः, स एव प्रतीतिविषयं देशकालकारणस्वभावानियतं बाह्यं वस्तु व्यवस्थापयंस्तदभावसाधनं बाधत इति कालात्ययापदिष्टत्वमपि हेतूनामित्युपरम्यते । समधिगता संख्या । सम्प्रति परिमाणनिरूपणार्थमाह- परिमाणं मानव्यवहारकारणमिति । मानव्यवहा- रोऽणु महत् दीर्घ ह्रस्वमित्यादिज्ञानं शब्दश्च, तस्य कारणं परिमाणमित्यनेन प्रत्यक्ष- सिद्धस्यापि परिमाणस्य विप्रतिपन्नं प्रति कार्येण सत्तां दर्शयति । यथा तावज्ज्ञानस्य ज्ञेयप्रसाधकत्वं तथोक्तम् । को ही मानना है । एवं इस पक्ष में नीलादि प्रतीतियों का कादाचित्कत्व (कभी होना कभी न होना) की उपपत्ति भी ठीक नहीं बैठती है; क्योंकि नीलादि विज्ञान के प्रयोजक क्षणसन्तान की सत्ता तो बराबर है ही । अगर सदा उसकी अनुवृत्ति नहीं रहती है तो फिर आगे नीलादि की प्रतीतियाँ नहीं होंगी । (प्र.) (यद्यपि) कार्य को अपने से भिन्न किसी की अपेक्षा नहीं है, फिर भी कारण का परिपाक कदाचित् ही होता है, अतः कार्य भी कभी होता है कभी नहीं । (उ.) कार्य के प्रति उन्मुख होना ही कारणों का परिपाक है, वह भी स्वसंवेदन रूप विज्ञान से भिन्न कुछ भी नहीं है, अतः उसका भी कादाचित्कत्व उचित नहीं है; किन्तु कार्यों का कादाचित्कत्व प्रत्यक्ष से सिद्ध है । यह प्रत्यक्ष ज्ञान देश, काल और स्वभाव से नियत अपने बाह्य विषय का स्थापन करते हुए उसके अभाव के साधक को भी बाधित करता है । इस प्रकार बाह्य अर्थ की सत्ता का लोप करनेवाले ये सभी हेतु कालात्यापदिष्ट हैं । (इस प्रकार) संख्या को अच्छी तरह समझा । 'परिमाणं मानव्यवहारकारणम्' इत्यादि से अब परिमाण का निरूपण करते हैं । अणु, महत्, दीर्घ, ह्रस्व इन सबों के ज्ञान एवं इन सबों के प्रतिपादक शब्दों के प्रयोग ये दोनों ही प्रकृत 'मानव्यवहार' शब्द से अभिप्रेत हैं । प्रत्यक्ष के द्वारा सिद्ध परिमाण को जो नहीं मानना चाहते, उन्हें (परिमाण के उक्त व्यवहार रूप) कार्य-लिङ्गक अनुमान की सूचना 'तस्य परिमाणम्' इत्यादि से देते हैं । जिस प्रकार ज्ञान अपने ज्ञेय अर्थ का साधक है, उसे (संख्याप्रकरण में) दिखला चुके हैं ।