भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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पृष्ठ 278

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१९ प्रशस्तपादभाष्यम् माण्डल्यम् । अनित्यं द्वयणुक एव । कुवल्यामलकबिल्वादिषु महत्त्वपि तत्प्रकर्षभावाभावमपेक्ष्य भाक्तोऽणुत्वव्यवहारः । दीर्घत्वह्रस्वत्वे यही अणुपरिमाण पारिमाण्डल्य कहलाता है । अनित्य (अणुपरिमाण) केवल द्वयणुक रूप द्रव्य में ही है । कुवलय, आमला और बेल प्रभृति के महत्परिमाणों में अणुत्व का जो व्यवहार होता है, वह महत्परिमाणों के न्यूनाधिकभाव के कारण गौण है । जिन आश्रयों के महत् (परिमाण) और अणु (परिमाण) उत्पत्ति- न्यायकन्दली नो प्रत्यक्षयति तत्राण्विति व्यवहारः । न चैवं सति त्र्यणुकस्याप्यणुत्वप्रसक्तिः ? तस्यापि प्रत्यक्षत्वात्, त्र्यणुकमस्मदादिप्रत्यक्षं बहुभिः समवायिकारणैरारब्धत्वात्, घटवत् । यस्य च प्रत्यक्षस्य द्रव्यस्यावयवा न प्रत्यक्षास्तदेव त्र्यणुकम् । आकाशपरिमाणस्य तु प्रत्यक्षहेतुत्वाभावेऽपि महत्त्वमेव, तदाश्रयस्य द्व्यणुकव्याप्तितोऽधिकव्यापित्वात्, घटादिपरिमाणवत् । अनित्यमणुपरिमाणं द्वयणुक एवेत्ययुक्तम्, कुवल्यामलकबिल्वादिषु परस्परा- पेक्षयाणुव्यवहारदर्शनादत आह-कुवल्यामलकबिल्वादिष्विति । बिल्वे यः प्रकर्षभावो महत्परिमाणातिशययोगित्वं तस्यामलकेऽभावमपेक्ष्याणुव्यवहारो भाक्तः । उभाभ्यां भज्यत इति भक्तिः सादृश्यम्, तस्यायमिति भाक्तः, सादृश्यमात्रनिबन्धनो गौण इत्यर्थः । एवमामलकपरिमाणातिशयाभावं काम नहीं होता है, उस परिमाण को 'अणु' कहते हैं । इसी से त्र्यसरेणु के परिमाण में अणुत्व की आपत्ति नहीं होती है; क्योंकि उसका प्रत्यक्ष होता है । त्र्यणुक की उत्पत्ति घटादि की तरह अनेक अवयवों से होती है, अतः वह हम लोगों के प्रत्यक्ष का भी विषय है । प्रत्यक्ष दीखने वाले जिस द्रव्य के अवयवों का प्रत्यक्ष न हो उसे 'त्र्यणुक' कहते हैं । घटादि के परिमाणों की तरह आकाशादि के परिमाण की व्याप्ति द्वयणुक के परिमाण की व्याप्ति से अधिक है, अतः आकाशादि के परिमाण भी महत् ही हैं । (प्र.) यह कहना ठीक नहीं कि 'अनित्य अणुपरिमाण' केवल द्वयणुक में ही हैं; क्योंकि कुवलय, आँवला और बेल इन सबों में 'आपेक्षिक अणुत्व' का व्यवहार देखा जाता है । इसी प्रश्न का उत्तर 'कुवल्यामलकबिल्वादिषु' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं । बेल में जो प्रकर्षभाव अर्थात् विलक्षण महत्परिमाण का सम्बन्ध है वह आँवले में नहीं है, इसी से आँवले में 'अणुत्व' का भाक्त व्यवहार होता है । अभिप्राय यह है कि 'उभाभ्यां भज्यत इति भक्तिः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार केवल सादृश्य से होनेवाले व्यवहार को 'भाक्त' कहते हैं । इसी प्रकार आँवले में जिस उत्कृष्ट महत्परिमाण का सम्बन्ध है, उस प्रकार के महत्परिमाण का सम्बन्ध कुवलय में नहीं है । इसी से कुवलय