वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 287, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३२७ प्रशस्तपादभाष्यम् संयोगापेक्षो वा द्वितूलके महत्त्वमारभते न बहुत्वमहत्त्वानि, समानसंख्यापलपरिमाणैरारब्धेऽतिशयदर्शनात् । द्वित्वसंख्या चाण्वोर्वर्तमाना बहुत्व संख्या से नहीं, महत्परिमाण से भी नहीं। अवयवों में रहनेवाला यह प्रचय उक्त महत्त्व के उत्पादन में कहीं अपने आश्रयरूप रूई के दो खण्डों के अवयवों के प्रशिथिल संयोगरूप प्रचय की अपेक्षा रखता है, कहीं वह अपने आश्रयीभूत दोनों अवयवों के उत्पादक साधारण संयोग की सहायता से ही उक्त महत्परिमाण को उत्पन्न करता है । दो परमाणुओं में रहनेवाली द्वित्व संख्या द्व्यणुक में परिमाण को उत्पन्न करती है । जिस न्यायकन्दली अथ कथं तत्र बहुत्वमहत्त्वयोरेव क्लृप्तसामर्थ्ययोः कारणत्वं नेष्यते ? तत्राह-न बहुत्वमहत्त्वानीति । प्रचयभेदापेक्षया बहुवचनम् । यत्र प्रचयविशेषात् परिमाणविशेष- प्रतीतिरस्ति तत्र बहुत्वं महत्त्वं च न कारणमित्यर्थः । अत्रोपपत्तिः - समानसंख्यापल- परिमाणैरारब्धेऽतिशयदर्शनात् । संख्या च पलं च परिमाणं च संख्यापलपरिमाणानि, समानानि संख्यापलपरिमाणानि येषां तैरारब्धे कार्येऽतिशयदर्शनात् । यदि हि संख्यैव कारणं समानसंख्यैस्त्रिभिश्चतुर्भिर्वा प्रशिथिलसंयोगैर्निबिडसंयोगैश्चारब्धयोर्द्रव्ययोः प्रशि- थिलसंयोगारब्धे निबिडसंयोगारब्धापेक्षया महत्यातिशयो न स्यात्, कारणसंख्याया उभय- त्रापि तुल्यत्वात् । तथा यदि महत्त्वमपि कारणं समानमहत्त्वैः प्रचितैरप्रचितैश्चारब्धयो- महत्परिमाण में एवं बहुत्व संख्या में महत्परिमाण की कारणता स्वीकृत है ही, फिर इन्हीं दोनों में से किसी को इस महत्परिमाण का भी कारण क्यों नहीं मान लेते ? इसी प्रश्न का समाधान 'न बहुत्वमहत्त्वानि' इत्यादि से देते हैं । 'बहुत्वमहत्त्वानि' इस पद में बहुवचन का प्रयोग उन दोनों के आश्रयों में जो बहुत्व है उसके अभिप्राय से है । 'विशेष प्रकार के प्रचय से उत्पन्न महत्परिमाण का कारण महत्त्व और बहुत्व संख्या नहीं हो सकती' इस सिद्धान्त की युक्ति ही "समानसंख्यापलपरिमाणैरारब्धेऽतिशयदर्शनात्" इस वाक्य के द्वारा प्रतिपादित हुई है । "संख्या च पलञ्च परिमाणञ्च संख्यापलपरिमाणानि, समानानि संख्यापल- परिमाणानि येषां तैः, आरब्धेऽतिशयदर्शनात्" अगर उक्त महत्त्व का कारण केवल संख्या ही हो, प्रचय नहीं, तो फिर तीन या चार अवयवों के प्रशिथिल संयोग से उत्पन्न परिमाण में एवं तीन या चार ही अवयवों के निबिड संयोग से उत्पन्न परिमाण में अन्तर उपपन्न नहीं होगा; क्योंकि दोनों द्रव्यों के कारणों की संख्या समान है । अगर केवल अवयवों के महत्त्व को ही उक्त महत्परिमाण का भी कारण मानें (प्रचय को नहीं) तो फिर