भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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३३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे पृथक्त्व- न्यायकन्दली एवं संख्या सह पृथक्त्वस्य साधर्म्यं प्रतिपाद्य वैधर्म्यं प्रतिपादयति- एतावांस्त्विति । संख्यायाः सकाशात् पृथक्त्वस्यैतावान् भेदो यथा संख्यात्वपर- सामान्यापेक्षयैकत्वद्वित्वादिकमपरसामान्यमस्ति, तथा पृथक्त्वत्वपरसामान्यापेक्षयैकपृथक्त्व- त्यादिकमपरसामान्यं नास्तीति । कथं तर्ह्यनेकेष्वेकपृथक्त्यादिव्यवान्तरप्रत्ययविशेषस्त- त्राह-संख्या तु विशिष्यत इति । अयमेकः पृथग् द्वाविमौ पृथगित्यादिसंख्या- विशिष्टो व्यवहारः पृथक्त्वे दृश्यते । तत्रैकत्र द्रव्ये वर्तमानं पृथक्त्वमेकार्थसमवेत- यैकत्वसंख्यया विशिष्यते, तद्विशेषश्चावान्तरव्यवहारविशेषः, अनुवृत्तिप्रत्ययश्च पृथक्त्व- सामान्यकृत एवेत्यभिप्रायः । एतेन परमाणुपरिमाणेऽपि परमाणुत्वं सामान्यं प्रत्याख्येयम्, परमशब्दविशिष्टतादेयाणुत्वसामान्याद् व्यवहारानुगमोपपत्तेः । अथ कस्मात् सर्वद्रव्यानुगत- मेकमेव पृथक्त्वमेकत्यादिसंख्याविशेषणभेदात् प्रत्ययभेदहेतुरिति नेष्यते ? नेष्यते, इस प्रकार संख्या के साथ पृथक्त्व का साधर्म्य दिखला कर अब 'एतावांस्तु' इत्यादि ग्रन्थ से संख्या से इसमें जो असाधारण्य है, उसका प्रतिपादन करते हैं । अर्थात् संख्या से पृथक्त्व में इतना ही अन्तर है कि संख्या में संख्यात्व रूप परसामान्य के अतिरिक्त एकत्वत्व द्वित्वत्वादि और अपरजातियाँ भी हैं; किन्तु पृथक्त्व में पृथक्त्वत्व रूप परसामान्य को छोड़कर एकपृथक्त्वत्वादि कोई अपर सामान्य नहीं है । (प्र.) तो फिर द्विपृथक्त्यादि विभिन्न पृथक्त्वविषयक प्रतीतियों में अन्तर क्यों कर होता है ? 'संख्या तु विशिष्यते' इत्यादि से इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । अभिप्राय यह है कि 'अयमेकः पृथक्, द्वाविमौ पृथक्' इत्यादि स्थलों में पृथक्त्व का व्यवहार संख्या के साथ ही देखा जाता है । इनमें एक ही द्रव्य में रहनेवाला पृथक्त्व अपने आश्रयरूप द्रव्य में समवायसम्बन्ध से रहनेवाली एकत्वसंख्या के द्वारा ही और पृथक्त्वों से अलग रूप में समझा जाता है । उस संख्यारूप विशेष से ही एकपृथक्त्वविषयक प्रतीति में द्विपृथक्त्यादिविषयक प्रतीतियों से अन्तर होता है । विभिन्न पृथक्त्वविषयक सभी प्रतीतियों में एकाकारत्व की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) तो पृथक्त्वत्व सामान्य से ही होता है । इसी रीति से परमाणुओं में रहनेवाले परिमाण में परमाणुत्व जाति का खण्डन करना चाहिए; क्योंकि ('परम' शब्द से युक्त सभी अणुओं में रहनेवाले अणुत्व रूप पर) सामान्य से ही सभी परमाणुओं में परमाणुत्व के व्यवहार का अनुगम होगा । (प्र.) इस प्रकार सभी द्रव्यों में रहनेवाला एक ही पृथक्त्व क्यों नहीं मानते ? उसी से संख्यारूप विशेषण के बल से (एकपृथक्त्व, द्विपृथक्त्यादि) विशेष प्रकार के व्यवहारों की उपपत्ति होगी । (उ.) इसलिए नहीं मानते हैं, चूँकि क्रमशः उत्पन्न होनेवाले द्रव्यों में सामान्य की तरह (उत्पत्तिक्षण में ही)