वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका २५ लौहखण्ड और तुलखण्डों के अवयवों की संख्या और परिमाण समान हैं । अतः उक्त अन्तर की उपपत्ति के लिए यही कल्पना करनी चाहिए कि लोहे के अवयवों के संयोग संघटित हैं और रूई के अवयवों के संयोग शिथिल (ढीले) हैं । अवयवों के इस शिथिल संयोग को ही 'प्रचय' कहते हैं । पृथक्त्व 'घट पट से पृथक् है' (अयम्स्मात् पृथक्) इस आकार की प्रतीति जिस गुण से हो, उसे 'पृथक्त्व' कहते हैं । यह भिन्न द्रव्यों में एक, दो या इनसे अधिक द्रव्यों को अवधि मानकर शेष द्रव्यों में रहता है । इस प्रकार यह भेद या अन्योन्याभाव-सा ही दीखता है; किन्तु अन्योन्याभाव की प्रतीति का 'घटभिन्नः पटः' इत्यादि प्रकार के होते हैं, अतः भेद से पृथक्त्व भिन्न है । अर्थात् भेद की प्रतीति के अभिलापक वाक्य में प्रयुक्त प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों के लिए प्रथमान्त पद का ही प्रयोग होता है; किन्तु पृथक्त्व की प्रतीति के लिए उनमें से अवधिभूत एक अर्थ का पञ्चम्यन्त पद से उपादान किया जाता है । संयोग असम्बद्ध दो द्रव्यों के परस्पर सम्बन्ध को ही 'संयोग' कहते हैं । यह तीन प्रकार का है-(१) दोनों सम्बन्धियों में से एकमात्र की क्रिया से उत्पन्न । जैसे पहाड़ और पक्षी का संयोग केवल पक्षी की क्रिया से उत्पन्न होता है । (२) दोनों सम्बन्धियों की क्रिया से उत्पन्न, जैसे लड़ते हुए दो पहलवानों का संयोग । (३) तीसरा संयोग संयोग से ही उत्पन्न होता है । जैसे हाथ और पुस्तक के संयोग से शरीर और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है । वैशेषिकों के सिद्धान्त में अवयव और अवयवी परस्पर अत्यन्त भिन्न हैं । अतः शरीर रूप अवयवी और हाथ-पैर प्रभृति अवयव परस्पर भिन्न हैं । अतः जिस प्रकार घट की क्रिया से भूतल और पट का संयोग उत्पन्न नहीं हो सकता, उसी प्रकार हाथ की क्रिया से शरीर और पुस्तक का संयोग भी उत्पन्न नहीं हो सकता; किन्तु शरीर में क्रिया के न रहने पर भी हाथ की क्रिया से पुस्तक के साथ जो हाथ और पुस्तक का संयोग उत्पन्न होता है, उसके बाद शरीर के साथ पुस्तक के संयोग की प्रतीति होती है । प्रतीति का अपलाप नहीं किया जा सकता । अतः शरीर और पुस्तक में भी संयोग मानना पड़ेगा; किन्तु यह संयोग अगर क्रिया से उत्पन्न होगा तो पुस्तक की क्रिया या शरीर की क्रिया या फिर उन्हीं दोनों की क्रिया से उत्पन्न होगा; किन्तु न शरीर में और न पुस्तक में ही क्रिया है । अतः प्रकृत में शरीर और पुस्तक के संयोग का कारण क्रिया को नहीं माना जा सकता; किन्तु असमवायिकारण तो क्रिया या गुण इन दोनों में से ही कोई होगा । प्रकृत में क्रिया