भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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३४० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- न्यायकन्दली कारणानि तेषां कार्येण ग्रहणं कार्यस्य तैः सह सम्बन्धः, तस्मात् सत्कार्यं सदेव, अविद्यमानस्य सम्बन्धाभावात् । असम्बद्धमेव कार्यं कारणैः क्रियत इति चेत् ? न, सर्वसम्भवाभावात्, असम्बद्धत्वाविशेषे सर्वं सर्वस्माद्भवेत् । न चैवम्, तस्मात् कार्यं प्रागुत्पत्तेः कारणैः सह सम्बद्धम् । यथाहूः – असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः कारणैः सत्त्वसङ्गिभिः । असम्बद्धस्य चोत्पत्तिमिच्छतो न व्यवस्थितिः ॥ इति । अपि च शक्तस्य जनकत्वम् ? अशक्तस्य वा? अशक्तस्य जनकत्वे तावद- तिप्रसक्तिः । शक्तस्य जनकत्वे तु किमस्य शक्तिः सर्वत्र ? क्वचिदेव वा? सर्वत्र चेत् ? सैवातिव्याप्तिः । अथ क्वचिदेव ? कथमसति तस्मिन् कारणस्य तत्र शक्तिर्नियतेति वक्तव्यम्, असतो विषयत्वायोगात् । तस्माच्छक्तस्य समझते हैं कि कार्य (कारण व्यापार से पहले भी) सत् है । 'उपादान' शब्द का यहाँ 'कारण' अर्थ है । अर्थात् कारणों के साथ कार्य के सम्बन्ध से भी समझते हैं कि कार्य (कारण व्यापार से पहले भी) सत् है; क्योंकि अविद्यमान वस्तु के साथ किसी का भी सम्बन्ध सम्भव नहीं है । (प्र.) कारणों के सम्बन्ध से रहित कार्य की ही उत्पत्ति कारणों से होती है ? (उ.) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि सभी कारणों से सभी कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । 'सर्वसम्भवाभावात्' (अगर कारणों के सम्बन्ध से रहित कार्य की उत्पत्ति हो तो) सभी कारणों से सभी कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए; क्योंकि कार्य की असम्बद्धता जैसे कारणों में है, वैसे और वस्तुओं में भी समान ही है; किन्तु सभी वस्तुओं से सभी कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है, अतः उत्पत्ति से पहले भी कार्य के साथ कारण का सम्बन्ध अवश्य है । जैसा कि सांख्यवृद्धों ने कहा है कि विद्यमान कारणों के साथ अविद्यमान कार्य का सम्बन्ध नहीं है । जो कोई कारण से असम्बद्ध कार्य की उत्पत्ति (उस) कारण से मानते हैं उनके मत में (नियत कारण से ही नियत कार्य की उत्पत्ति हो इस) व्यवस्था की उपपत्ति नहीं होगी । और भी बात है, (१) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति से युक्त वस्तुओं में कारणता है ? या (२) कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति से रहित वस्तुओं में कारणता है । इनमें दूसरा पक्ष मानें (तो तन्तु- प्रभृति कारणों से घटादि कार्यों की उत्पत्ति रूप) अतिप्रसक्ति होगी । अगर कार्य को उत्पन्न करने की शक्ति से युक्त ही कारण है, तो फिर इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि कारण में रहनेवाली यह शक्ति सभी कार्यविषयक है ? या विशेष कार्यविषयक ? इनमें अगर पहला पक्ष मानें तो फिर कथित अतिप्रसक्ति बनी बनायी है । अगर दूसरा पक्ष मानें तो यह भी कहना पड़ेगा कि कारण की वह शक्ति किसी विशेष असत् कार्य में नियमित कैसे है ? क्योंकि असत् वस्तु तो किसी का विषय नहीं हो सकती, अतः शक्ति से युक्त