वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३४५ न्यायकन्दली समवाय्यसमवायिकारणयोरन्यतरविनाशाद्विनश्येत् ? अथ गुणानतिरेकिणी ? तदाश्रय- विनाशाद्विरोधिगुणप्रादुर्भावाद्वा विनश्येदिति, समवायस्यानभ्युपगमात् । यस्य यतो विनाशं प्रतीमस्तस्य तमेव विनाशहेतुं ब्रूमो न पुनरमुं त्वत्कृतं समयमभ्युपगच्छामः, प्रतीतिपराहतत्वात् । यदि चावश्यमभ्युपेयस्तदा द्रव्यगुणयोरेव विनाशं प्रत्यभ्युपगम्यतां यत्र परिदृष्टः, शक्तिः पुनरियं सादृश्यवत् पदार्थान्तरं प्रकारान्तरेणापि विनंक्ष्यति । कार्योत्पादानुत्पादाभ्यां यद्यावधिगता शक्तिः कुत एव सर्वभावेषु कल्प्यत इति चेत् ? एकत्र तस्याः कार्योत्पादानुगुणत्वेन कल्पितायाः सर्वत्र तदुत्पत्त्यैवात्रानुमानात् । अत्रोच्यते-न मन्त्रादिसन्निधौ कार्यानुत्पत्तिरदृष्टं रूपमाक्षिपति । यथान्वय- व्यतिरेकाभ्यामवधृतसामर्थ्यो वह्निर्दाहस्य कारणम्, तथा प्रतिबन्धकमन्त्रादि- प्रागभावोऽपि कारणम् । स च मन्त्रादिप्रयोगे सति निवृत्त इति सामग्रीवैगुण्यादेव दाहस्यानुत्पत्तिर्न तु शक्तिर्वैकल्यात् । भावस्य भावरूपकारणनियतत्व- से नहीं) अगर वह गुण स्वरूप है, तो फिर वह आश्रय के नाश से या विरोधी दूसरे गुण की उत्पत्ति से ही नष्ट होगी; क्योंकि हम समवाय नहीं मानते । जिससे जिसके नाश की हमको प्रतीति होती है, उसे ही हम उसके नाश का कारण मानते हैं । तुम्हारे बनाये हुए (द्रव्य का नाश उसके समवायिकारण के नाश से हो या असमवायिकारण के नाश से ही हो, एवं गुण का नाश आश्रय के नाश से या विरोधी गुण की उत्पत्ति से ही हो ) इस नियम को हम नहीं मानते; क्योंकि यह प्रतीति के विरुद्ध है । अगर उक्त सिद्धान्त को मानना आवश्यक ही हो तो द्रव्य और गुण के नाश के लिए ही उसे मानिए, जहाँ कि वह देखा गया है । शक्ति तो सादृश्यादि की तरह दूसरा ही पदार्थ है, अतः वह दूसरे ही प्रकार से नष्ट होगा । (उ.) दाहरूप कार्य की उत्पत्ति और अनुत्पत्ति से वह्नि में जिस प्रकार की शक्ति का निश्चय करते हैं, उस प्रकार की शक्ति की कल्पना सभी भाव पदार्थों में क्यों करते हैं ? (प्र.) एक जगह कार्य की अनुकूलता से जैसी शक्ति की कल्पना करते हैं, दूसरी जगह भी कार्य की उत्पत्ति से ही उसी प्रकार की शक्ति की कल्पना करते हैं । (उ.) इस पूर्वपक्ष के समाधान में कहना है कि मन्त्रादि का सामीप्य रहने पर दाह की अनुत्पत्ति से वह्नि में किसी अदृश्य शक्ति की कल्पना आवश्यक नहीं है; क्योंकि अन्वय और व्यतिरेक से वह्नि में दाह की कारणता की कल्पना जिस प्रकार करते हैं, उसी प्रकार अन्वय और व्यतिरेक से ही दाह के प्रति मन्त्रादि प्रतिबन्धकों के प्रागभाव में भी कारणता की कल्पना करते हैं । मन्त्रादि का प्रागभावरूप यह कारण मन्त्रादि की सन्निधि रहने पर नहीं रहता है, अतः मन्त्रादि के प्रयोग के स्थल में दाह नहीं होता है । उक्त स्थल में दाह की अनुत्पत्ति शक्ति के