भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका २७ विनाश रूप होगा । शरीर में क्रिया है नहीं, क्रिया है हाथ में । हाथ की क्रिया से शरीर के संयोग का विनाश कैसे होगा ? हाथ की क्रिया से जिस संयोग-विनाश की उत्पत्ति होगी वह तो हाथ में ही रहेगी, शरीर में नहीं । अतः विभाग संयोग का अभावरूप नहीं है; किन्तु गुणरूप भाव ही है । विभाग को भावरूप मान लेने से प्रतीतियों की उपपत्ति दिखलायी जा चुकी है । विभागजविभाग भी दो प्रकार का है-(१) कारणमात्रजन्य और (२) समवायि- कारणविभागजन्य । जिस विभाग की उक्त होगी, उस विभाग के समवायि- कारणीभूत द्रव्यों के ही विभाग से जो विभाग उत्पन्न हो उसे 'कारण- मात्रविभागजन्य विभाग' कहते हैं । घट-नाश से लेकर उसके उत्पादक कर्मनाश पर्यन्त के पर्यालोचन से यहाँ की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी । उसका यह क्रम है कि . पहले घट के अवयव रूप दोनों कपालों में क्रिया (हलचल) की उत्पत्ति होती है । फिर घट के उत्पादक दोनों कपालों में विभाग उत्पन्न होता है । कपालों के इस विभाग से घट के उत्पादक कपालों के संयोग का नाश होता है । चूँकि कपालों का संयोग घट का असमवायिकारण है, अतः इसके नाश से घट का नाश होता है । तब तक कपालों में क्रिया रहती ही है । घट-नाश के बाद कर्म से युक्त उन कपालों का संयोग पहले के जिस देश के आकाश के साथ था, उस देश से कपालों का विभाग उत्पन्न होता है । आकाश के साथ कपालों के इस विभाग का असमवायिकारण पहले कहा गया दोनों कपालों का क्रियाजनित विभाग ही है । पूर्व देशों के आकाश से एक-दूसरे से विभक्त दोनों कपालों का यह विभाग ही "कारणमात्रविभागजन्य विभागजविभाग" है; क्योंकि इस विभाग के समवायि- कारण दोनों कपाल और पूर्वदेशों का आकाश है । अतः दोनों कपाल भी इस विभाग के समवायिकारण हैं । अतः प्रकृत विभाग के समवायिकारणीभूत केवल दोनों कपालों के विभाग से ही वह उत्पन्न होता है, किन्हीं और द्रव्यों के विभाग से नहीं । इसके बाद विभागजविभाग से कपालों का जिस पूर्वदेश के साथ पहले संयोग था, उस संयोग का नाश होता है । फिर दूसरे देशों के आकाश (उत्तरदेश) के साथ इन विभक्त कपालों का संयोग होता है । कपालों की उस क्रिया का नाश होता है, जिससे दोनों कपालों का विभाग उत्पन्न हुआ था । इस प्रसङ्ग में इन दो विषयों को भी समझना आवश्यक है-(१) जिस क्रिया से कपालों का परस्पर विभाग उत्पन्न होता है, उस क्रिया से ही विभक्त कपालों के पूर्वदेश के आकाश के साथ कथित विभाग की उत्पत्ति क्यों नहीं मानते ? क्योंकि क्रिया में विभाग की हेतुता स्वीकृत है । एवं क्रिया की सत्ता इस विभाग के कई