भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 325

३६४ न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संयोग- प्रशस्तपादभाष्यम् प्राप्तिपूर्विकाऽप्राप्तिर्विभागः । स च त्रिविधः – अन्यतरकर्मजः, उभयकर्मजः, विभागजश्च विभाग इति । तत्रान्यतरकर्मजोभयकर्मजौ बाद उत्पन्न अप्राप्ति का नाम ही 'विभाग' है। वह १. अन्यतरकर्मज, २. उभयकर्मज और ३. विभागज विभाग भेद से तीन प्रकार का है। इनमें अन्यतरकर्मज विभाग और उभयकर्मज विभाग इन दोनों की सभी बातें न्यायकन्दली भाक्तः प्रत्ययोऽयमिति चेत् ? तर्हि विभागस्याप्रत्याख्यानम्, निष्प्रधानस्य भाक्तस्याभावात् । तस्य कार्यं दर्शयति-शब्दविभागहेतुश्चेति । न केवलं विभक्तप्रत्ययनिमित्तं शब्द- विभागहेतुश्चेति चार्थः । वंशदले पाट्यमाने योऽयमाद्यः शब्दः, स तावद् गुणान्तर- निमित्तः, शब्दत्वात्, भेरीदण्डसंयोगजशब्दवत् । न चायं संयोगजः, तस्याभावात् । तस्माद् वंशदलविभागज एवायम्, तद्भावभावित्वात् । विभागस्य विभागहेतुत्वं चानन्तरं वक्ष्यामः । प्राप्तिपूर्विकाऽप्राप्तिरिति तस्य लक्षणकथनम् । अधर्म इति नञ् यथा धर्मविरोधिनि गुणान्तरे, न तु धर्माभावे, तथा अप्राप्तिरिति नञ् प्राप्तिविरोधिनि गुणान्तरे, न तु प्राप्तेरभावे । प्राप्तौ पूर्वस्थितायां याऽप्राप्तिः (प्र.) ('ये दोनों विभक्त हैं' इत्यादि) प्रतीतियाँ तो गौण हैं ? (उ.) इस गौणता की प्रतीति से भी विभाग का मानना आवश्यक है; क्योंकि प्रधान के बिना गौण नहीं होता है । 'शब्दविभागहेतुश्च' इस वाक्य से विभाग के द्वारा उत्पन्न होने वाले कार्य दिखलाये गये हैं । उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'च' शब्द से यह सूचित होता है कि विभाग केवल विभक्त प्रत्यय का ही कारण नहीं है; किन्तु शब्द और (विभागज) विभाग का भी कारण है । ('विभाग से शब्द उत्पन्न होता है' इसमें यह अनुमान प्रमाण है कि) जिस प्रकार भेरी और दण्ड के संयोग से उत्पन्न शब्द का, शब्द से भिन्न उक्त संयोग कारण है, उसी प्रकार बाँस का दो भाग करने पर जो पहला शब्द होता है, उसका भी स्व (शब्द) से भिन्न कोई दूसरा ही गुण कारण है । एवं इस शब्द का (भेरी के उक्त शब्द की तरह) संयोग भी कारण नहीं है, अतः चूँकि बाँस के दोनों दलों की सत्ता के बाद ही उक्त शब्द की उत्पत्ति होती है, अतः बाँस के दोनों दलों का विभाग ही उस शब्द का कारण है । विभाग से (दूसरे) विभाग की उत्पत्ति का विवरण हम आगे देंगे । 'प्राप्तिपूर्विकाऽप्राप्तिः' इस वाक्य से विभाग का लक्षण कहा गया है । जिस प्रकार 'अधर्म' शब्द में प्रयुक्त नञ् शब्द धर्म के विरोधी पाप रूप दूसरे गुण का बोधक है, उसी प्रकार प्रकृत 'अप्राप्ति' शब्द में प्रयुक्त 'नञ्' शब्द भी प्राप्ति (संयोग) रूप