वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३६१ प्रशस्तपादभाष्यम् विनाशः । यदा कारणयोर्वर्तमानो विभागः कार्यविनाशविशिष्टं कालं त्यतन्त्रं वाप्यवयवमपेक्ष्य सक्रियस्यैवावयवस्य कार्यसंयुक्तादा- काशादिदेशाद् विभागमारभते न निष्क्रियस्य, कारणाभावादुत्तरसंयोगा- रूप) कार्य का (अभाव) नाश होता है । उस समय (विभाग के आश्रय और विभाग के अवधि रूप) दोनों अवयवों में विद्यमान क्रिया कार्य से संयुक्त आकाशादि देशों के साथ क्रिया से युक्त अवयवों के ही विभाग को उत्पन्न करती है । (यह दूसरी बात है कि) उसे इस विभाग के उत्पादन में कार्य के नाश से युक्त काल या आश्रयीभूत अवयव के साहाय्य की भी न्यायकन्दली विभागकर्तृत्वे विशिष्टविभागात्नुत्पादाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशो न भवेदित्यर्थः । संयोग- विनाशे किं स्यादत आह-तस्मिन्निति । संयोगेऽसमवायिकारणे तस्मिन्नष्टे कारणस्याभावात् कार्याभाव इति न्यायादवयविनो विनाशः । अवयवद्वये नष्टे किं स्यादत आह-तदेति । द्रव्ये विनष्टे तत्कारणयोरवयवयोरवर्तमानो विभागः कार्यविनाशेन विशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वा अवय- वमपेक्ष्य सक्रियस्यैवावयवस्य कार्यसंयुक्तादाकाशादिदेशाद् विभागमारभते । यावत् कार्यद्रव्यं न विनश्यति, तावदवयवस्य स्वातन्त्र्यम् । पृथग्देशगमने योग्यता नास्तीत्यवयवदेशाद् विभागो न घटते, तदर्थमुक्तं कार्यविनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वाप्यवयवमपेक्षते । कारणयोर्वर्त- (अवयव की क्रिया में) आकाश विभाग का भी कर्तृत्व अगर मान लें तो फिर उससे (अवयवी के नाशजनक) विशेष प्रकार के विभाग की उत्पत्ति नहीं होगी । फलतः (अवयवी) द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश नहीं होगा । दोनों अवयवों के संयोग के विनाश से कौन-सा कार्य होगा ? (जिसके न होने का आपने भय दिखलाया है ।) इसी प्रश्न का समाधान 'तस्मिन्' इत्यादि से कहा गया है । 'तस्मिन्नष्टे' अर्थात् (अवयवी के) असमवायिकारण रूप उस संयोग के नष्ट होने पर 'कारण के अभाव से कार्य का अभाव' इस न्याय से अवयवी का नाश होगा । अवयविरूप द्रव्य के नाश होने पर क्या होगा ? इस प्रश्न कां समाधान 'तदा' इत्यादि पङ्क्ति से कहा गया है । अर्थात् (अवयविरूप द्रव्य के नष्ट हो जाने पर उसके कारणीभूत दोनों अवयवों में रहनेवाला विभाग) क्रिया से युक्त अवयवों के ही आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न करता है । उस (विभाग) को इस विभाग के उत्पादन में (अवयविरूप) कार्य के नाश से युक्त काल, स्वतन्त्र रूप से केवल अवयव, इन दोनों में से किसी एक का साहाय्य अपेक्षित होता है । अवयविरूप कार्यद्रव्य के विनष्ट हुए बिना उसके अवयवों में स्वतन्त्र रूप से दूसरे देश में जाने की योग्यता नहीं आती ।