भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७५ न्यायकदली विषयस्य बाधो निश्चितः स्यात् । इह त्वसौ सन्दिग्धः, पत्रशतव्यति- भेदस्याशुभावित्वेनापि निमित्तेन यौगपद्यग्राहकस्य प्रत्यक्षस्य प्रवृत्तेः सम्भवात् । अस्ति च सर्वलोकप्रसिद्धम् 'अतिदृढमव्यवहिता सूची भिनत्ति, न व्यवहितम्' इति व्याप्तिग्राहकं प्रमाणम् । अतस्तत्सामर्थ्यात् प्रत्यक्षे सम्भवत्यपि भवत्यनुमानस्योदय इति । एवं चेदत्र व्यधिकरणा क्रिया विभागं न करोतीति व्याप्तिग्राहकस्य प्रमाणस्यातिदृढत्वात् प्रत्यक्षस्य चान्यथाप्युपपत्तेः सुस्थितं क्रमानुमानम् । अत एव चानेन प्रत्यक्षस्य बाधः । इदं हि सविषयम् । निर्विषयं च प्रत्यक्षम्, आशुभावित्वमात्रेण प्रवृत्तेः । यच्च सविषयं तत् तथात्वेनावस्थितस्य विषयस्य साहाय्याप्त्या सबलम्, दुर्बलं च निर्विषयम- सहायत्वात् । व्याप्तिग्राहकेणैव प्रत्यक्षेण हि बाधो यदनुमानेन प्रत्यक्षस्य बाधः । तथा च दिङ्मोहादिष्वनुमानमेव बलवदिति मन्यन्ते वृद्धाः 'भवति वै प्रत्यक्षादप्यनुमानं बलीयः' इति वदन्तः । वृद्धावुन्मन्तग्राहिणः प्रत्यक्षस्य तु नान्यथोपपत्तिरस्तीति का भ्रान्तिरूप होना किस प्रकार सम्भव है ? । (उ.) तो फिर 'कमल के सौ पत्तों का छेदन क्रमशः ही होता है' इस क्रमानुमान की निष्पत्ति किस प्रकार होगी ? क्योंकि वहाँ भी तो प्रत्यक्ष का विरोध है । अगर यह मानें कि (प्र.) वहीं प्रत्यक्ष के विरोध से अनुमान की प्रवृत्ति रोकी जाती है, जहाँ उनके विषय का प्रत्यक्ष के द्वारा बाधित होना निश्चित हो । अनुमान के विषय कमल के पत्तों के क्रमशः छेदन का प्रत्यक्ष के द्वारा बाध सन्दिग्ध है; क्योंकि सौ पत्तों का छेदन अतिशीघ्रता से क्रमशः होने से भी यौगपद्य (एक ही समय उत्पन्न होने) के ग्राहक प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति हो सकती है । 'सूई अगर किसी से व्यवहित न रहे, तो अतिदृढ़ वस्तु का भी भेदन करती है एवं व्यवहित होने पर नहीं' यह सर्वजनीन अनुभव ही (उक्त क्रमानुमान के कारणीभूत) व्याप्ति का निश्चायक है । अतः इस व्याप्ति के बल से विरोधी प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति रहने पर भी अनुमान का उदय होता है । (उ.) तो फिर प्रकृत में भी 'एक अधिकरण में रहनेवाली क्रिया दूसरे अधिकरण में विभाग को उत्पन्न नहीं करती है' व्याप्ति का यह प्रमाण अत्यन्त दृढ़ है । एवं उक्त यौगपद्य प्रत्यक्ष की उपपत्ति और प्रकार से भी हो सकती है । अतः (दीवाल से हाथ का विभाग एवं दीवाल से शरीर का विभाग इन दोनों के) क्रमशः होने का अनुमान सुस्थिर है । अतएव इस अनुमान से प्रत्यक्ष का बाध होता है; क्योंकि यह (अनुमान) सविषयक (यथार्थ) है और प्रत्यक्ष निर्विषयक (भ्रम) है । केवल दोनों के अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण ही यौगपद्य में प्रवृत्ति है । सविषयक (यथार्थ) ज्ञान उस (ज्ञान के द्वारा प्रकाशित) रूप से यथार्थतः विद्यमान वस्तु की सहायता प्राप्त होने के कारण बलवान् है । निर्विषयक (अयथार्थ) ज्ञान उससे दुर्बल है; क्योंकि वह असहाय है । अनुमान से प्रत्यक्ष का यह बाध वस्तुतः व्याप्ति के ग्राहक प्रत्यक्ष के द्वारा ही किया जाता है । अतएव 'कहीं

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