भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८९ प्रशस्तपादभाष्यम् तन्त्वंशवन्तरविभागाद्विभाग इत्यदोषः। आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव विभागो विनष्टो न तन्त्वंशवन्तरविभाग इति। एतस्मादुत्तरो विभागो जायते, अङ्गुल्या- काशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्, तस्मिन्नेव काले कर्म संयोगं कृत्वा विनश्यतीत्यदोषः। (उ.) (आश्रय के विनाश से विभागनाश के प्रसङ्ग में जो उत्तर विभाग की अनुत्पत्ति का अतिप्रसङ्ग दिया गया है, उसका यह समाधान है कि) उत्तर विभाग आकाशादि देशों के साथ तन्तु के (विभागज) विभाग एवं तन्तु और तन्तु के अनारम्भक दूसरे अंशु, इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होता है, अतः (प्रकृत में उक्त विभागानुत्पत्ति रूप) दोष नहीं है; क्योंकि आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं का विभाग ही नष्ट होता है, इससे तन्तु और (उसके अनुत्पादक) दूसरे तन्तु, इन दोनों के विभाग का नाश नहीं होता। इसी विभाग से आकाशादि देशों के साथ तन्तु के इस उत्तर विभाग की उत्पत्ति होती है, जैसे कि अङ्गुलि और आकाश के विभाग से शरीर और आकाश के विभाग की उत्पत्ति होती है। उसी समय क्रिया उत्तर (देश) संयोग को उत्पन्न कर स्वयं भी विनष्ट हो जाती है। इस प्रकार अनित्य द्रव्यों की क्रिया में चिर- स्थायित्व और परमाणुओं में रहनेवाली क्रियाओं में नित्यत्व रूप दोनों दोषों का निराकरण हो जाता है। न्यायकन्दली तन्तौ कर्मोत्पन्नं तन्त्वन्तराद् विभागसमकालं तदंशुनापि तन्तुसंयुक्तेन समं विभागमार- भते। स च विभागस्तन्तोरंशोश्चावस्थानादवस्थित इत्याह-आश्रयविनाशात् तन्त्वोरेव विभागो विनष्टः, तन्त्वंशवन्तरविभागस्त्ववस्थित इति। किम्तो यद्येवमित्यत आह-एतस्मादिति । अङ्गुल्याकाश- विभागाच्छरीराकाशविभागवत् । यथा कर्मजादङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीरा- दूसरे तन्तु के साथ विभाग की उत्पत्ति के समय ही तन्तु के साथ संयुक्त अंशु के साथ भी विभाग को उत्पन्न करती है। यह विभाग (अपने आश्रय) तन्तु और अंशु के विद्यमान रहने के कारण रहता ही है। यही बात 'आश्रयविनाशात्त- न्त्वोरेव विभागो विनष्टः' इत्यादि सन्दर्भ से कहा गया है। अर्थात् आश्रय के विनाश से दोनों तन्तुओं के विभाग का ही विनाश होता है, तन्तु और दूसरे अंशु का विभाग तो रहता ही है। अगर ऐसी बात है तो इससे प्रकृत में क्या? इसी प्रश्न का समाधान 'एतस्मात्' इत्यादि से दिया गया है। 'अङ्गुल्याकाशविभागाच्छरीराकाशविभागवत्' इस उदाहरण वाक्य का यह तात्पर्य है कि जैसे अंगुलि और आकाश के विभाग से शरीर और