वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे परत्वापरत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् द्रष्टुर्युवानमवधिं कृत्वा स्थविरे विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्य परेण कालप्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्यापरेण कालप्रदेशेन संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिरिति । हुए केश और शरीर की शिथिलता (प्रभृति) की स्थिति, इन दोनों स्थितियों के रहते हुए दोनों को देखनेवाले पुरुष को उक्त युवा पुरुष की अपेक्षा उक्त वृद्ध पुरुष में 'विप्रकृष्ट' बुद्धि अर्थात् कालकृत परत्व (ज्येष्ठत्व) की बुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद इसी बुद्धि के साहाय्य से दूसरे कालप्रदेश के साथ के संयोग से (वृद्ध पुरुष) में कालकृत परत्व (ज्येष्ठत्व) की उत्पत्ति होती है । एवं इसी वृद्ध पुरुष की अपेक्षा युवा पुरुष में 'सन्निकृष्ट' बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी बुद्धि के साहाय्य से दूसरे कालप्रदेश के साथ (युवा) पुरुष के संयोग से कालकृत अपरत्व (कनिष्ठत्व) की उत्पत्ति होती है । न्यायकन्दली कथिता, कालकृतयोरपि तयोरुत्पत्तिः कथमिति प्रश्नः । समाधानं वर्तमानकालयोरिति । द्वयोरेकस्मिन् वा पिण्डेऽविद्यमाने परत्वापरत्वे न भवतः, तदर्थं वर्तमानकालयोरित्युक्तम् । अनियतदिग्देशयोरित्येकदिश्यवस्थितयोर्भिन्नदिगवस्थितयोर्वा युवस्थविरयो रूढश्मश्रु च कार्क- श्यं च वलिश्च पलितं च येषां कालविप्रकर्षलिङ्गानां सान्निध्ये सत्येकस्य द्रष्टुर्युवानं रूढ- अपरत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'वर्तमान- कालयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है । इस समाधान वाक्य में 'वर्त्तमानकालयोः' यह पद इसलिए दिया गया है कि चूँकि दोनों ही पिण्डों के न रहने पर या दोनों में से किसी एक के न रहने पर भी (उनमें से किसी में) परत्व या अपरत्व की उत्पत्ति नहीं होती है । 'अनियतदिग्देशयोः' अर्थात् एक दिशा में अथवा विभिन्न दिशाओं में स्थित युवक और वृद्ध पुरुष में (से युवा पुरुष में रहनेवाले) मूँछों का कड़ापन और देह का कड़ा गठन एवं (वृद्ध पुरुष की) झुर्री और पके केश प्रभृति काल के ज्ञापक हेतुओं का सामीप्य रहने पर दोनों को देखनेवाले किसी एक पुरुष को मूँछों की कड़ाई और देह के काठिन्य से युवा पुरुष में अल्पकाल सम्बन्धरूप कनिष्ठत्व या सन्निकृष्ट बुद्धिरूप ज्येष्ठत्व की अनुमिति होती है । इस अल्पकाल को अवधि मानकर झुर्री और पके केश वाले वृद्ध पुरुष में अधिककाल सम्बन्धरूप ज्येष्ठत्व या कालविप्रकृष्टत्व की बुद्धि उत्पन्न होती है । इस प्रकार उस वृद्ध पुरुष में कालिक परत्व (ज्येष्ठत्व) की उत्पत्ति