भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 371

४०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व- प्रशस्तपादभाष्यम् बुद्धेश्चापेक्षाबुद्धिर्विनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्विनाशात् परत्वस्य विनाशः । द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथम् ? यदा परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्न- मवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षाबुद्ध्योर्युग- पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले विभा- द्रव्य का नाश एवं उक्त सामान्यविषयक बुद्धि और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों का भी नाश होता है । इसके बाद उक्त द्रव्यनाश और अपेक्षा- बुद्धि का विनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है । (५) (प्र.) द्रव्यनाश और संयोगनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ? (उ.) (जहाँ) जिस समय परत्वादि के आधारभूत द्रव्यके अवयवमें उत्पन्न क्रिया उसके दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय परत्वादि के आधारभूत (अवयवि) द्रव्य में भी क्रिया एवं अपेक्षाबुद्धि दोनों की उत्पत्ति पहिले की तरह होती है, इसके बाद जिस समय परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी न्यायकन्दली द्रव्यसंयोगविनाशादपीत्यादि । द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथंम् विनाशः ? यदा परत्वा- धारावयवे कर्मोत्पन्नमवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षाबुद्ध्योर्युग- पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्या- रम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डस्य च विभागः क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्ड- (५) 'द्रव्यसंयोगादवि' इत्यादि भाष्यग्रन्थ के द्वारा यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य का विनाश और संयोग का विनाश इन दोनों से परत्वादि का विनाश कैसे होता है ? (उ.) (जहाँ) जिस समय परत्वादि के आधारभूत अवयव में कर्म उत्पन्न होकर अपने आश्रयरूप अवयव का दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करता है, उसी समय एक साथ ही अवयवी में क्रिया और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय परत्व की उत्पत्ति होती है, उसी समय अवयवों के विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का भी विनाश होता है । एवं अवयवी की क्रिया के द्वारा दिशा से अवयवी का विभाग भी उत्पन्न होता है। इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय (परत्व गुण में रहनेवाले) सामान्य का ज्ञान होता है, उसी समय द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश से अवयवी का विनाश भी उत्पन्न होता है ।

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित) · पृष्ठ 371, कुल 759 में से · BharatKosha