भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका ३७ अनुमान का हेतु भी 'व्यभिचारी' है; क्योंकि इस अनुमान में भी कोई सपक्ष नहीं हो सकता, चूँकि सभी पदार्थ पक्ष के अन्तर्गत आ जाते हैं। अतः उक्त अनुमान के हेतु का व्यापकत्व साध्य में रहने पर भी व्यापकीभूत वह साध्य किसी स पक्ष में हेतु के साथ नहीं रह सकता; क्योंकि वहाँ कोई सपक्ष ही नहीं है। जो हेतु साध्य के बदले साध्याभाव के साथ ही नियमित रूप से रहे, उस हेतु को 'विरुद्ध' हेत्वाभास कहते हैं। अर्थात् हेतु का साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहना 'विरोध' नाम का हेतुदोष है, जिस दोष से युक्त हेतु 'विरुद्ध' नाम का हेत्वाभास है। 'वि' अर्थात् विशेष रूप से साध्य की अनुमिति को जो 'रुन्ध' करे, अर्थात् साध्य के साथ नियत रूप से न रहकर साध्याभाव के साथ ही नियमित होकर व्यतिरेकव्याप्ति को विघटित करते हुए जो अनुमिति को विघटित करे, वही विरुद्ध नाम का हेत्वाभास है। नियमतः साध्य के साथ ही रहनेवाले हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही 'विरोध' दोष है, यह विरोध दोष से युक्त हेतु ही 'विरुद्ध' नाम का हेत्वाभास है। जैसे कि 'ह्रदो वह्निमान् जलात्' इस अनुमिति का जल हेतु 'विरुद्ध' हेत्वाभास है; क्योंकि जलरूप हेतु वह्निरूप साध्य के साथ न रहकर वह्नि के अभाव के साथ ही नियमित रूप से रहता है। अतः जलरूप हेतु का अभाव वह्नि का व्यापकीभूतत अभाव है, इस अभाव का प्रतियोगित्व कथित जल-हेतु में है। जिस प्रकार हेतु के साथ साध्य का नियमित रूप से रहना व्याप्ति का प्रयोजक है, उसी प्रकार साध्याभाव के साथ हेत्वभाव का नियमित रूप से रहना भी व्याप्ति का एक प्रयोजक है, जिसे व्यतिरेक व्याप्ति कहते हैं। साध्याभाव के साथ नियमित रूप से रहनेवाले (साध्याभाव-व्यापकीभूत) हेत्वभाव का प्रतियोगित्व ही व्यतिरेकव्याप्ति है। इस व्याप्ति के शरीर में साध्याभावव्यापकीभूताभाववाला जो अंश है, उसी को विरोध दोष अपने साध्याव्यापकीभूताभाववाले अंश के द्वारा विघटित कर व्यतिरेक व्याप्ति को विघटित कर देता है। इस विरोध दोष के प्रसङ्ग में एवं विरुद्ध हेत्वाभास के प्रसङ्ग में बाद में भी अधिक परिवर्तन नहीं हुआ। जिस हेतु के प्रयोग करने पर 'प्रकरण' की अर्थात् परस्पर विरुद्ध दो पक्षों की 'चिन्ता' अर्थात् संशय ही उपस्थित हो, उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष का निर्णय संभव न हो, वह हेतु अगर उन दोनों पक्षों में से किसी भी एक पक्ष के निर्णय के लिए प्रयुक्त हो, तो वह हेतु 'प्रकरणसम' नाम का हेत्वाभास होगा। शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए नैयायिक अगर 'नित्यधर्मानुपलब्धि' को हेतु रूप से उपस्थित करें तो उनका यह हेतु 'प्रकरणसम' नाम का हेत्वाभास होगा; क्योंकि प्रतिपक्षी मीमांसक भी तुल्य युक्ति से शब्द में नित्यत्व साधन के 'अनित्यधर्मानुपलब्धि' हेतु को उपस्थित कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में शब्द में