भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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४६४ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् भावद्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादीनामुपलब्धाधारसमवेतानामाश्रयग्राहकैरिन्द्रियैर्ग्रहण- मित्येतदस्मदादीनां प्रत्यक्षम् । अस्मद्विशिष्टानां तु योगिनां संयोग से प्रत्यक्ष होता है । (उन्हीं) भाव (सत्ता) द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि का प्रत्यक्ष उनके आश्रयीभूत वस्तुओं के ग्राहक इन्द्रियों से होता है, जिनके आश्रय प्रत्यक्ष के द्वारा ग्रहण के योग्य हों । न्यायकन्दली अपरे तु सर्वत्र यथासम्भवं संयोगसमवाययोरेव हेतुत्वादवान्तरसम्बन्धकल्पनां नेच्छन्ति, ईदृशो हि तेषां भावानां स्वभावो यदेषामन्यसन्निकर्षादेव ग्रहणम् । अतिप्रसङ्गश्च नास्ति, स्वाश्रयप्रत्यासत्तेर्नियामकत्वात् । उपसंहरति—एतदस्मदादीनां प्रत्यक्षमिति । अस्मदादीनामयोगिना- मित्यर्थः । योगिप्रत्यक्षमाह-अस्मद्विशिष्टानां त्विति । योगः समाधिः । स द्विविधः-सम्प्रज्ञातोऽसम्प्रज्ञातश्च । सम्प्रज्ञातो धारकेण प्रयत्नेन किसी सम्प्रदाय के लोग प्रत्यक्ष के लिए (१) संयोग और (२) समवाय इन दो ही सम्बन्ध को आवश्यक मानते हैं एवं (संयुक्त समवायादि) अवान्तर सम्बन्ध की कल्पना को निरर्थक समझते हैं, अर्थात् द्रव्य में चक्षु का जो संयोग है, उसी से द्रव्य की तरह उसमें रहनेवाले सामान्य, गुण एवं कर्मादि के भी बोध होंगे, एवं समवाय सम्बन्ध से शब्द एवं उसमें रहनेवाले शब्दत्वादि सामान्यों का भी बोध होगा । कुछ वस्तुओं का यह स्वभाव स्वीकार करेंगे कि दूसरे के साथ के सन्निकर्ष से भी उनका प्रत्यक्ष होता है । संयोग सन्निकर्ष से यदि घटत्व या घट रूप का प्रत्यक्ष हो सकता है, तो फिर उसी सम्बन्ध से शब्द का भी प्रत्यक्ष हो (क्योंकि दोनों में ही संयोग सन्निकर्ष की असत्ता समान रूप से है) इस पक्ष में उक्त अतिप्रसङ्गों की भी सम्भावना नहीं है, क्योंकि आश्रय में सन्निकर्ष का रहना नियामक होगा (अर्थात् इस पक्ष में ऐसा नियम है कि इन्द्रिय का संयोग सन्निकर्ष जिस द्रव्य के साथ रहेगा, उसमें रहनेवाले सामान्य, गुण या कर्म का ही उस संयोग सन्निकर्ष से भान होगा । शब्द के आश्रय आकाश रूप द्रव्य में चक्षु का प्रत्यक्षजनक सन्निकर्ष नहीं है । इसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए) । 'एतदस्मदादीनां प्रत्यक्षम्' इस वाक्य के द्वारा (अस्मदादि के प्रत्यक्ष का) उपसंहार करते हैं । उक्त वाक्य में प्रयुक्त 'अस्मदादि' शब्द का अर्थ है योगियों से भिन्न जीव । 'अस्मद्विशिष्टानाम्' इत्यादि संदर्भ के द्वारा योगियों के प्रत्यक्ष का निरूपण करते हैं । 'योग' शब्द का अर्थ है समाधि । यह योग (१) सम्प्रज्ञात और (२) असम्प्रज्ञात भेद से दो प्रकार का है । धारक प्रयत्न के द्वारा आत्मा के किसी प्रदेश में नियोजित मन का और तत्त्वज्ञान की इच्छा से युक्त आत्मा का संयोग ही 'सम्प्रज्ञातयोग' है । वश किए हुए मन का बिना किसी विशेष अभिलाषा के पहिले ही बिना विचारे हुए