भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका ३९ की व्याप्ति जलत्व में है एवं जल में वह्न्यभावव्याप्य जलत्व सर्वदा ही विद्यमान है। अतः इस प्रकार का हेतु सदा ही सत्प्रतिपक्षित रहेगा। अतः सत्प्रतिपक्ष नित्य दोष है। महर्षि गौतम ने चौथे हेत्वाभास का नाम 'साध्यसम' कहा है और उसके स्वरूप को समझाने के लिए 'साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः' यह सूत्र लिखा है। पहले से जो सिद्ध नहीं रहता है वही 'साध्य' कहलाता है। हेतु के लिए यह आवश्यक है कि वह पहले से 'सिद्ध' रहे। अर्थात् उसमें असाध्य की व्याप्ति सिद्ध रहे। एवं (साध्यव्याप्ति से युक्त) हेतु स्वयं पक्ष में सिद्ध रहे; किन्तु जिस अनुमान का हेतु पहले से सिद्ध नहीं है, वह हेतु साध्य के समान ही है, अतः उसे 'साध्यसम' कहा गया है। अगर कोई 'छाया द्रव्य है क्योंकि वह गतिशील है' इस प्रकार से अनुमान का प्रयोग करे तो यहाँ 'गतिशीलत्व' हेतु 'साध्यसम' हेत्वाभास होगा; क्योंकि 'छाया में गति है' यही पहले से सिद्ध नहीं है। अतः छाया में द्रव्यत्व की सिद्धि की तरह छाया में गति की भी सिद्धि अपेक्षित है। 'साध्यसम' हेत्वाभास को ही नव्य नैयायिकों ने 'असिद्ध' शब्द से व्यक्त किया है। एवं (१) आश्रयासिद्ध, (२) स्वरूपासिद्ध और (३) व्याप्यत्वासिद्ध इसके ये तीन भेद किये हैं। जिसमें साध्य की सिद्धि अभिप्रेत हो उसे पक्ष कहते हैं। पक्ष को ही 'आश्रय' भी कहते हैं। आश्रय अगर सिद्ध नहीं रहेगा तो अनुमान कहाँ होगा ? अगर कोई साधारण फूलों के दृष्टान्त से आकाशकुसुम में गन्ध का अनुमान करे, तो वहाँ के सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे। एवं स्वर्णमय पर्वत में अगर कोई वह्नि का अनुमान करे तो वहाँ के भी सभी हेतु आश्रयासिद्ध होंगे। यद्यपि पर्वत असिद्ध नहीं है, किन्तु पर्वत में स्वर्णमयत्व असिद्ध है। अतः स्वर्णमय पर्वतरूप विशिष्टपक्ष भी असिद्ध है। हेतु यदि कथित पक्ष में विद्यमान न रहे तो वह हेतु 'स्वरूपासिद्ध' हेत्वाभास होगा। जैसे कि जल में कोई धूम हेतु से भी वह्नि का अनुमान करना चाहेगा तो वहाँ का धूमहेतु स्वरूपासिद्ध हेत्वाभास होगा; क्योंकि जल रूप पक्ष में धूम हेतु नहीं है। भाष्यकार ने जो असिद्ध का उदाहरण दिया है, वह स्वरूपासिद्ध का ही उदाहरण है; क्योंकि छाया या अन्धकार में गति रूप हेतु नहीं है। इससे ऐसा भान होता है कि वात्स्यायनादि प्राचीन नैयायिकों ने केवल स्वरूपासिद्ध को ही असिद्ध मानते थे। असिद्ध के और भेद बाद में किये गये। हेतु में उसके विशेषणीभूत धर्म (हेतुतावच्छेदक) के अभाव और साध्य में साध्यतावच्छेदक के अभाव को व्याप्यत्वासिद्ध दोष कहते हैं। इस दोष से युक्त हेतु व्याप्यत्वासिद्ध हेत्वाभास है। 'पर्वतो वह्निमान् काञ्चनमयधूमात्' इस अनुमान के हेतु धूम में काञ्चनमयत्वरूप हेतुतावच्छेदक नहीं है। अतः वह (हेत्वप्रसिद्धि