भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 448, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 448

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ४८३ न्यायकन्दली चिन्ता, स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः' प्रक्रियते प्रस्तूयत इति प्रकरणं पक्षप्रतिपक्षौ, तयोश्चिन्ता विचारः, सा यत्कृता स निर्णयार्थमुपदिष्ट उभयपक्षसाम्यान्न प्रकरण- साम्येऽन्यतरपक्षनिर्णयाय कल्पते । यथा नित्यः शब्दोऽनित्यधर्मानुपलब्धेः, अनित्यः शब्दो नित्यधर्मानुपलब्धेरिति शब्दे नित्यानित्यधर्मयोरनुपलम्भाश्रित्यत्यसंशये सति तद्विचारोऽभूत्, अन्यतरधर्मग्रहणे तत्तन्निश्चयाद् विचारस्याप्रवृत्तेः । तत्रानित्यधर्मानुपलम्भो नित्यत्व- विनिश्चयार्थमुपदिष्टः, नित्यधर्मानुपलम्भोऽनित्यत्वविनिश्चयार्थमुपदिष्टः, नित्यधर्मानु- पलम्भं प्रतिपक्षमप्रतिवर्तमानो न निर्णयाय कल्पते, तत्प्रतिबन्धात् । स चायं सम्भवत्प्रतिपक्षे धर्मिणि वर्तमान एकस्मिन्नन्ते नियतो न भवतीत्यनै- प्रकरणसम हेत्वाभास की सत्ता रहती है । एवं निश्चित विपक्ष में 'कालातया- पदिष्ट' हेत्वाभास की सत्ता रहती है । अभिप्राय यह है कि (न्यायसूत्र में) प्रकरणसम के लक्षण के लिए यह सूत्र निर्दिष्ट है कि 'यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमुपदिष्टः प्रकरणसमः ।' 'प्रक्रियते प्रस्तूयते इति प्रकरणम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार उपस्थित किये जानेवाले पक्ष और प्रतिपक्ष ये दोनों ही इस सूत्र में प्रयुक्त 'प्रकरण' शब्द के अर्थ हैं ।'तयोश्चिन्ता प्रकरणचिन्ता' अर्थात् कथित पक्ष और प्रतिपक्ष की जो 'चिन्ता' अर्थात् विचार, फलतः संशय जिससे उत्पन्न हो, उन दोनों में से किसी एक पक्ष के निश्चय के लिए प्रयुक्त हेतु ही प्रकरणसम नाम का हेत्वाभास है, क्योंकि वह हेतु दोनों पक्षों के साधन के लिए समान ही है, (अतः प्रकरणसम है) । उन दोनों में से कोई एक हेतु एक पक्ष का निर्णायक नहीं हो सकता । जैसे कि एक ने यह पक्ष उपस्थित किया कि 'शब्द नित्य है, क्योंकि अनित्य वस्तुओं में रहनेवाले धर्मों की उपलब्धि शब्द में नहीं होती है । दूसरा पक्ष उपस्थित हुआ कि 'शब्द अनित्य है', क्योंकि नित्य पदार्थों में रहनेवाले धर्म की उपलब्धि उसमें नहीं होती । इस प्रकार नित्यों में रहनेवाले धर्म को ज्ञापन करने का सामर्थ्य मान लिया जाय तो फिर साध्य के धर्मी पक्ष में साध्य के अभाव रूप धर्मों एवं अनित्यों में रहनेवाले धर्मों की अनुपलब्धि से शब्द में नित्यत्व और अनित्यत्व का संशय उपस्थित होगा । इस संशय के कारण ही 'प्रकरण' का उक्त 'चिन्ता' रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों में से एक (नित्य या अनित्य) धर्म का निर्णय रूप विचार उपस्थित होता है । उन दोनों में से एक (नित्य या अनित्य) धर्म का निर्णय हो जाने पर तो उक्त विचार की प्रवृत्ति ही नहीं होगी । इन दोनों में शब्द में नित्यत्व के निश्चय के लिए अनित्य धर्म के अनुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है, एवं शब्द में अनित्यत्व के निश्चय के लिए नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु का प्रयोग होता है । इनमें अनित्यधर्मानुपलब्धि रूप हेतु नित्यधर्म के अनुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को पराजित नहीं कर सकता, (इसी प्रकार नित्यधर्मानुपलब्धिरूप हेतु अनित्यधर्मानुपलब्धिरूप प्रतिपक्ष को भी पराजित नहीं कर सकता), अतः शब्द में नित्यत्व या अनित्यत्व का निर्णय नहीं हो सकता, क्योंकि दोनों ही अपने प्रतिपक्ष के द्वारा प्रतिहत हैं । अतः यह हेतु