भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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४८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे अनुमान- न्यायकन्दली नन्वेवमप्यलक्षणमिदमव्यापकत्वात् । त्रिविधो हि हेतुः-अन्वयी, व्यतिरेकी, अन्वयव्यतिरेकी चेति । तत्रान्वयी विशेषोऽभिधेयः, प्रमेयत्वात्, सामान्यवत् । अस्य हि पक्षादन्यः सर्व एव सदसत्प्रभेदः सपक्षः, प्रमातृमात्रस्य प्रमाणमात्रापेक्षयाऽनभिधेयस्या- प्रमेयस्याभावात् । यश्च पुरुषमात्रस्यानभिधेयोऽप्रमेयश्च, स वाजिविषाणवदसन्नेव, न वा सपक्षो विपक्षो वा स स्यात्, निःस्वभावत्वात् । यश्च सत् स सर्वः सपक्ष एवेति तदभावे च नास्त्येवेत्यव्यापकं लक्षणम्, व्यतिरेकाभावात् । अगमकमेव तदिति चेन्न, अन्वयाव्यभि- चारात् । अन्यस्य सद्भावादन्यस्य सिद्धिरित्यत्रान्वयः कारणम्, तस्य तु व्यभिचार- प्रतीतिरपवादिका । अस्ति तावत् प्रमेयत्वाभिधेयत्वयोरन्वयः, सर्वत्र प्रमेयेऽभिधेयत्वस्य दर्शनात् । न च व्यभिचारो दृष्टो नापि शङ्कामारोहति, यं यं व्यतिरेकविषयं बुद्धिगोचरी- (प्र.) प्रकरणसम और कालात्ययापदिष्ट हेत्वाभासों में अतिव्याप्ति के न होने पर भी हेतु का यह लक्षण 'तदभावे च नास्त्येव' इस विशेषण के कारण केवलान्वयि हेतु में अव्याप्त या अव्यापक ही है । अभिप्राय यह है कि (१) अन्वयी (केवलान्वयी), (२) (केवल) व्यतिरेकी, एवं (३) अन्वयव्यतिरेकी भेद से हेतु तीन प्रकार के हैं । इनमें 'विशेषोऽभिधेयः प्रमेयत्वात् सामान्यवत्' १ इस अनुमान का हेतु अन्वयी (केवलान्वयी) है । इस अनुमान के पक्ष से अतिरिक्त जितने भी भाव और अभाव पदार्थ हैं, वे सभी सपक्ष हैं, क्योंकि कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है, जो किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित नहीं है (अर्थात् प्रमेय नहीं है) और किसी (शब्द) प्रमाण का अभिधेय नहीं है । जो न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा शब्द से निर्दिष्ट होता है और न किसी प्रमाता पुरुष के द्वारा प्रमित ही होता है, वह घोड़े के सींग की तरह सर्वथा असत् होने के कारण न सपक्ष ही हो सकता है, न विपक्ष ही, क्योंकि असत् वस्तुओं का कोई स्वभाव नहीं होता । जितने भी पदार्थ 'सत्' हैं, वे सभी इस अनुमान के सपक्ष ही हैं । अतः इस अनुमान में व्यतिरेक नहीं है, अर्थात् कोई विपक्ष नहीं है । सुतराम् 'तदभावे च नास्त्येव' हेतु लक्षण का यह अंश उक्त केवलान्वयी हेतु में नहीं रहने के कारण हेतु का उक्त लक्षण अव्याप्ति से दुष्ट है । यदि यह कहें कि (प्र.) केवलान्वयी हेतु से अनुमान होता ही नहीं । (उ.) तो यह कहना सम्भव नहीं होगा, क्योंकि एक की सत्ता से दूसरे की जो सिद्धि होती है, इसमें 'अन्वय' ही कारण है । चूँकि इस कार्यकारणभाव में कोई व्यभिचार उपलब्ध नहीं है, (अतः 'केवलान्वयि-हेतु से अनुमिति नहीं होती' यह नहीं कहा जा १. अनुमान प्रयोग का आशय है कि जिस प्रकार घटत्वादि जातियाँ प्रमेय होने के कारण अभिधेय हैं, उसी प्रकार 'विशेष' अर्थात् घटादि व्यक्ति भी प्रमेय होने के कारण अभिधेय हैं।