वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 462, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषाानुवादसहितम् ४१७ न्यायकदली तदात्मतया च व्यवस्थितयोर्वृक्षव्यावृत्त्यशिशंपाव्यावृत्त्योः सत्यपि भेदे यथाध्यवसायं तादात्म्यमिति चेत् ? सिद्धे तादात्म्ये सत्यशिशंपाव्यावृत्त्या धर्मिण्यवृक्षव्यावृत्तिरध्यवसेया, तत्राध्यवसितायामवृक्षव्यावृत्तौ यथाध्यवसायं तादात्म्यसिद्धिरित्यन्योन्याश्रयदोषः । व्याप्तिग्रहणवेलायामेकात्मतयाध्यवसितयोर्व्यावृत्त्योस्तादात्म्यसिद्धिरिति चेत् ? तथाध्यव- सितयोर्भेदः काल्पनिकः । यद्यनुमानं कल्पनासमारोपेणापि प्रवर्तेत, न कश्चिद्धेतुर्नाम । प्रमेयत्वानित्यत्वयोरेकात्मतयाध्यवसितयोर्यथाध्यवसायं हैं । (प्र.) वृक्ष और शिंशपा इन दोनों में यद्यपि तादात्म्य है, किन्तु वृक्ष और शिंशपा इन दोनों से क्रमशः अभिन्नरूप से निश्चित अवृक्षव्यावृत्ति (वृक्षभिन्न- भिन्नत्व) और अशिशंपाव्यावृत्ति (शिंशपाभिन्नभिन्नत्व) ये दोनों व्यावृत्तियाँ परस्पर भिन्न हैं । अतः दोनों व्यावृत्तियों में वास्तविक भेद रहते हुए भी ज्ञानीय अभेद (अर्थात् 'दोनों अभिन्न हैं' इस आकार के भ्रमात्मक ज्ञान के द्वारा गृहीत अभेद) हैं, औप इसी अभेद के कारण अशिशंपाव्यावृत्ति रूप हेतु के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होता है¹ । (उ.) यह कहना भी सम्भव नहीं है (क्योंकि इससे अन्योन्याश्रय दोष होगा) चूँकि तादात्म्य के रहने पर अशिशंपाव्यावृत्ति के द्वारा वृक्ष रूप धर्मी में अवृक्षव्यावृत्ति का अनुमान होगा, कथित साध्य साधनभूत दोनों व्यावृत्तियों में तादात्म्य तब होगा, जब कि पक्ष रूप शिंशपा में अनुमान के द्वारा अवृक्षव्यावृत्ति की प्रतीति हो जाएगी, अतः अन्योन्याश्रयदोष होगा । (प्र.) व्याप्ति ज्ञान के समय में ही जो दोनों व्यावृत्तियों का अभेद गृहीत होता है, उसी से तादा- त्म्य की सिद्धि होती है, अतः (अनुमितिमूलक उक्त अन्योन्याश्रय दोष नहीं है) । (उ.) तो फिर यह कहिए कि अभिन्नरूप से ज्ञायमान दोनों व्यावृत्तियों का अभेद काल्पनिक है, वास्तविक नहीं । यदि हेतु प्रभृति के काल्पनिक ज्ञान से भी अनुमान की प्रवृत्ति मानें, तो हेत्वाभास नाम की कोई वस्तु ही नहीं रह जाएगी । इस प्रकार तो प्रमेयत्व एवं अनित्यत्व इन दोनों में भी एकात्मता (अभेद) का विपर्यय हो ही सकता है, और इस विपर्यय रूप अध्यवसाय के द्वारा प्रमेयत्व और अनित्यत्व में भी काल्पनिक अभेद रहेगा ही । (प्र.) (जहाँ अनित्यत्व नहीं है, वहाँ भी प्रमेयत्व है, इस प्रकार) विपक्षव्यावृत्ति के न रहने के कारण प्रमेयत्व
- अवृक्षव्यावृत्त हैं वृक्ष से भिन्न सभी पदार्थों के भेदों का समूह एवं अशिशंपाव्यावृत्त है, शिंशपावृक्षमात्र को छोड़ और सभी पदार्थों के भेदों का समूह, इन दोनों भेदों के समूह भिन्न हैं, क्योंकि दोनों भेदों के प्रतियोगी समूह अलग-अलग हैं, पहले प्रतियोगीसमूह में शिंशपा नहीं है, क्योंकि शिंशपा भी वृक्ष ही है । दूसरे समूह में शिंशपा को छोड़कर और सभी वृक्ष भी हैं; क्योंकि सभी वृक्ष शिंशपा नहीं है ।