वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽभावान्तर्भाव- न्यायकन्दली नापि स्मृत्यारूढा व्याप्रियते, पूर्वमसंविदितत्वात् । न ह्यनुपलब्धिः प्रमाणान्तरसंवेद्या, अभावरूपत्वात् । अनुपलब्ध्यन्तरापेक्षायां चानवस्था स्यात् । तस्मादियमगृहीतैवेन्द्रि- यवदर्थपरिच्छिदिकेति राद्धान्तः, तथा सति कुतस्तस्याः स्मरणम् ? अनुभवाभावात् । अथ मतम्-देवकुले देवदत्तानुपलम्भो देवदत्तोपलम्भेन विनिवर्त्यते, न च देशान्तरगतस्य तदुपलम्भो जातः, तस्मादस्त्येव तदनुपलम्भः। यदि त्ववस्थान्तरमापन्नः, न चावस्थाभेदे वस्तुभेद इति । अस्तु तर्हि तावदिहैवम् । यत्र तु पूर्वं प्रतियोगिस्मरणाभावाद् वस्त्वभावो न गृहीतः, पश्चात् कालान्तरे वस्तुग्रहणादिहेदानीं नासीदिति प्राक्तनाभावज्ञानम्, तत्र कः प्रती- यह कहना भी सम्भव नहीं है कि (प्र.) स्मृति के द्वारा उपस्थापित अनुपलब्धि से ही वहाँ अभाव का बोध होगा, (उ.) क्योंकि अनुपलब्धि का पहले अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति सम्भव नहीं है । अनुपलब्धि चूँकि अभाव रूप है, अतः प्रत्यक्षादि पाँचों (भावबोधक) प्रमाणों में से किसी से भी उसका बोध सम्भव नहीं है । दूसरी अनुपलब्धि से यदि प्रकृत प्रमाणभूत अनुपलब्धि का अनुभव मानें, तो फिर कारणीभूत उस अनुपलब्धि के अनुभव के लिए तीसरी अनुपलब्धि की आवश्यकता होगी, जो अन्त में अनवस्था में परिणत होगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि जिस प्रकार इन्द्रिय से प्रत्यक्ष के उत्पादन में उसके ज्ञात होने की आवश्यकता नहीं होती है, उसी प्रकार अनुपलब्धि रूप प्रमाण भी स्वयं बिना ज्ञात हुए ही केवल अपनी सत्ता के द्वारा ही अपने अभाव रूप अर्थ के निश्चय का उत्पादन करता है । तस्मात् पूर्व में अनुपलब्धि का अनुभव न रहने के कारण उसकी स्मृति किस प्रकार हो सकती है ? यदि यह कहिए कि (प्र.) देवकुल में देवदत्त की जो अनुपलब्धि है वह केवल देवदत्त की उपलब्धि से ही हट सकती है । देवकुल से आनेवाला पुरुष जब दूसरे देश में चला आता है, उस समय उसे देवदत्त की उपलब्धि तो हो नहीं पाती । अतः (जिस समय वह दूसरे के पूछने पर देवकुल में देवदत्त के अभाव का प्रतिपादन करता है) उस समय देवकुल में देवदत्त की अनुपलब्धि बनी हुई है । मान लिया कि उस समय की अनुपलब्धि से इस समय की अनुपलब्धि दूसरी अवस्था में है; किन्तु कोई भी वस्तु केवल अवस्था के बदल जाने से दूसरी वस्तु नहीं हो जाती । (उ.) यह मान भी लिया जाय कि उक्त रीति से देवकुल में देवदत्त के कथित अभाव के प्रतिपादन की इस प्रकार उपपत्ति की जा सकती है, तथापि जहाँ प्रतियोगी का स्मरण न रहने के कारण किसी एक अधिकरण में पहले उस प्रतियोगी का अभाव ज्ञात न हो सका, फिर कुछ काल बीत जाने पर उसी अधिकरण में उस प्रतियोगी रूप वस्तु का ग्रहण हुआ । ऐसे अधिकरण में उस समय उसी वस्तु के पूर्वकालिक अभाव का