भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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५५८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव- प्रशस्तपादभाष्यम् तथैवैतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एवेति ! पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानु- इसी प्रकार 'ऐतिह्य' भी सत्य अर्थ का बोधक एवं आप्त से उच्च- रित शब्द प्रमाण ही है (फलतः अनुमान ही है) । अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझाने के लिए (प्रसिद्ध) पाँच अवयव (पञ्चावयव) वाक्यों का प्रयोग ही 'परार्थानुमान' है । (अर्थात्) न्यायकन्दली गवाश्वयोरितरेतरात्मताप्रतिषेधः । अत्यन्ताभावे तु सर्वथा असद्भूतस्यैव बुद्ध्यावारोपितस्य देशकालानवच्छिन्नः प्रतिषेधः । यथा षट्पदार्थेभ्यो नान्यत् प्रमेयमस्तीति । यदि चात्यन्ताभावो नेष्यते, षडेव पदार्था इत्ययं नियमो दुर्घटः स्यात् । ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव 'इति ह' इति निपातसमुदाय उपदेशपारम्पर्ये वर्तते, तत्रायं स्वार्थिकः ष्यञ्प्रत्ययः, ऐतिह्यमिति । वितथमैतिह्यं तावत् प्रमाणमेव न भवति । अवितथमाप्तोपदेश एव । आप्तोप- देशश्चानुमानम् । तस्मादवितथमैतिह्यमनुमानान्न व्यतिरिच्यत इत्यभिप्रायः । परार्थानुमानव्युत्पादनायाह-पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थ- प्रतिपादनं परार्थानुमानमिति । प्रतिपादनीयस्यार्थस्य यावति शब्दसमूहे प्रतीतिः पर्यवस्यति, तस्य पञ्चभागाः समूहापेक्षयावयवा इत्युच्यन्ते । स्वयं साध्यानन्तरीयकतवेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः, साध्याविनाभूतं लिङ्गम्। वस्तु का 'इस आश्रय में यह कभी किसी भी प्रदेश में नहीं है' इस प्रकार का प्रतिषेध ही अत्यन्ताभाव है । जैसे द्रव्यादि छः पदार्थों से अतिरिक्त कोई वस्तु नहीं है (इस प्रकार का प्रतिषेध अत्यन्ताभाव रूप है) यदि अत्यन्ताभाव न मानें तो 'पदार्थ छः ही हैं' इस प्रकार का अवधारण कठिन होगा । 'ऐतिह्यमप्यवितथमाप्तोपदेश एव' इस वाक्य में प्रयुक्त 'ऐतिह्य' शब्द 'इति ह' इन दोनों निपातों से स्वार्थ में 'ष्यञ्' प्रत्यय से निष्पन्न होता है । ये दोनों निपात 'परम्परा से प्राप्त उपदेश' रूप अर्थ के बोधक हैं । अभिप्राय यह है कि जो 'ऐतिह्य' रूप वचन (या उपदेश) असत्य है, वह तो प्रमाण ही नहीं है । जो ऐतिह्य प्रमा ज्ञान का उत्पादक है, वह आप्तवचन को छोड़कर और कुछ भी नहीं है । (यह उपपादन कर चुके हैं कि) आप्तोपदेश अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः ऐतिह्य भी अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । 'पञ्चावयवेन वाक्येन स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं परार्थानुमानम्' यह वाक्य परार्थानुमान को समझाने के लिए कहा गया है । अभीष्ट अर्थ की प्रतीति जिन शब्दों के समूह से सम्पन्न होती है, उसके पाँच खण्ड होते हैं । वाक्य के वे ही पाँच खण्ड वाक्यसमूह की अपेक्षा (अर्थात् उक्त समूह को अवयवी मानकर) उसके अवयव कहलाते हैं । 'स्वयं साध्यानान्तरीयकतवेन निश्चितोऽर्थः स्वनिश्चितार्थः' इस व्युत्पत्ति के