वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४८ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रथमतः अभाव के (१) अन्योन्याभाव और (२) संसर्गाभाव ये दो भेद हैं । तादात्म्य नाम का एक सम्बन्ध है, जिसके द्वारा इस सम्बन्ध के प्रतियोगी का अभेद उसके अनुयोगी में प्रतीत होता है । जैसे कि 'नरः सुन्दरः' इस बुद्धि में भासित होनेवाले तादात्म्य सम्बन्ध के द्वारा 'नर' और 'सुन्दर' में अभेद प्रतीत होता है । जिस अभाव की प्रतियोगिता इस तादात्म्य सम्बन्ध से नियमित हो या अविच्छिन्न हो, उस प्रतियोगिता के आश्रयीभूत वस्तु का अभाव ही अन्योन्याभाव है । इस अभिप्राय से ही 'तादात्म्यसम्बन्धावच्छिन्नप्रतियोगिताकोऽभावोऽन्योन्या- भावः' अन्योन्याभाव का यह लक्षण प्रसिद्ध है । अन्योन्याभाव का ही दूसरा नाम 'भेद' है । 'अन्योन्यस्मिन् अन्योन्यस्याभावः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो अभाव जिस अनुयोगी में रहे, अगर उस अनुयोगी का अभाव भी प्रथमोक्त अभाव के प्रतियोगी में रहे तो वह अभाव 'अन्योन्याभाव' है । जैसे कि 'घटो न' इस आकार का अन्योन्याभाव पट में है । यतः अनुयोगीभूत इस पट का भी अन्योन्या- भाव घट में है । अन्योन्याभाव के बोधक वाक्य में उसके प्रतियोगी के बोधक पद और अनुयोगी के बोधक पद दोनों ही प्रथमान्त होते हैं, जैसे कि 'घटो न पटः' । किन्तु संसर्गाभाव के अभिलापक वाक्य में प्रतियोगि के बोधक पद तो प्रथमान्त होते हैं; किन्तु अनुयोगी के बोधक पद प्रायः सप्तम्यन्त होते हैं, जैसे कि 'भूतले घटो नास्ति' । अन्योन्याभाव को छोड़कर और सभी अभाव संसर्गाभाव कहलाते हैं । संसर्गा- भाव के द्वारा अनुयोगी में प्रतियोगी के संसर्ग का ही प्रतिषेध होता है । 'भूतले घटो नास्ति' यहाँ पर यद्यपि भूतल में घट के निषेध का ही व्यवहार होता है; किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर वह प्रतिषेध भूतल में घटसंयोग का ही प्रतिषेध प्रतिपन्न होता है; क्योंकि भूतल में यतः घट का संयोग है, अतः भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट की सत्ता है । सुतरां भूतल में घट संयोग की सत्ता ही घटसत्ता का नियामक है । अतः भूतल में घट संयोग की असत्ता ही घट की असत्ता की प्रयोजिका होगी । (१) प्रागभाव, (२) प्रध्वंसाभाव और (३) अत्यन्ताभाव भेद से संसर्गाभाव तीन प्रकार का है । कार्य की उत्पत्ति से पहले उपादानकारण में कार्य के जिस अभाव का व्यवहार होता है वह 'प्रागभाव' है । जैसे कि तन्तु में पट का अभाव, दूध में दही का अभाव इत्यादि । यह यद्यपि अनादि है; किन्तु इसका विनाश होता है; क्योंकि पट की उत्पत्ति के बाद तन्तु में पुनः इस अभाव की प्रतीति नहीं होती है ।