वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽवयव- न्यायकन्दली तत्सिद्धयर्थं पश्चात् साधनमाकाङ्क्षते तदनु साधनसामर्थ्यमिति प्रथमं साध्य- वचनमेवोपत्तिष्ठते, न पुनरग्रत एव साधनसामर्थ्यमुच्यते, तस्य तदानीमनपेक्षितत्वात् । प्रतिपिपादयिषितेन धर्मेण विशिष्टो धर्मेति विप्रतिषिद्धमिदम्, अप्रतीतस्यावि- शेषकत्वादिति चेत् ? सत्यम्, अप्रतीतं विशेषणं न भवति, प्रतीतस्तु साध्यो धर्मः सपक्षे विप्रतिपन्नं प्रति ज्ञापनाय धर्मिविशेषणतया प्रतिज्ञायते । अत एव धर्मिणः पक्षता वास्तवी, तस्य स्वरूपेण सिद्धस्यापि प्रतिपाद्यधर्मविशिष्टत्वेनाप्रसिद्धस्य तेन रूपेण आपाद्य- मानत्वसम्भवात् । पक्षधर्मतापि हेतोरित्थमेव, यदि केवलमेवानित्यत्वं साध्यते, भवेच्छब्द- धर्मस्य कृतकत्वस्यापक्षधर्मता, शब्द एव त्वनित्ये साध्ये नायं दोषः । यदाहुराचार्याः - साध्य की आकाङ्क्षा निवृत्त हो जाने पर फिर साध्य की सिद्धि के लिए साधन और उसके प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा जागती है, बाद में साधन के (पक्षधर्मतादि) सामर्थ्य के प्रसङ्ग में आकाङ्क्षा उठती है । अतः पहले प्रतिज्ञारूप साध्य वचन की ही उपस्थिति उचित होती है । यह नहीं होता कि पहले (उपनय के द्वारा) साधन के सामर्थ्य का ही प्रदर्शन हो; क्योंकि उस समय उसकी अपेक्षा ही नहीं है । (प्र.) धर्मी का यह लक्षण ठीक नहीं मालूम पड़ता कि जिस धर्म का प्रतिपादन इष्ट हो, उस धर्मरूप विशेषण से युक्त ही 'धर्मी' (या पक्ष) है; क्योंकि ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं कि एक ही वस्तु प्रतिपादन के लिए अभीष्ट भी हो एवं वही (अप्रतिपादित) वस्तु विशेषण भी हो; क्योंकि विशेषण के लिए यह आवश्यक है कि वह पहले से ज्ञात हो (पहले से ज्ञात वस्तु कभी प्रतिपाद्य नहीं हो सकती)। (उ.) यह ठीक है कि विशेषण को (स्व से युक्त धर्मी के ज्ञान से) पहले ज्ञात होना ही चाहिए; किन्तु प्रकृत में भी तो साध्यरूप धर्म पहले से सपक्ष (दृष्टान्त) में ज्ञात ही रहता है । सपक्ष में ज्ञात साध्य के प्रसङ्ग में जिस पुरुष को पक्ष में विप्रतिपत्ति है उसे समझाने के लिए ही साध्यरूप विशेषण से युक्त धर्मी का निर्देश प्रतिज्ञा वाक्य के द्वारा किया जाता है । चूँकि (पर्वतत्वादि) अपने स्वरूप से सिद्ध रहने पर भी प्रतिपाद्य (वह्नि प्रभृति) साध्यरूप धर्म से युक्त होकर वह पहले से प्रसिद्ध नहीं है, अतः उस रूप से पक्ष का प्रतिपादन सम्भव है । इसी कारण धर्मी का पक्ष होना (धर्मी की पक्षता) वास्तविक है (काल्पनिक नहीं) । इसी प्रकार हेतु की पक्षधर्मता भी ठीक ही है; क्योंकि ('शब्दोऽनित्यः कृतकत्वाद् घटादिवत् इत्यादि स्थलों में) यदि केवल अनित्यत्व का ही साधन करें तो शब्द में रहनेवाले कृतकत्व में पक्षधर्मता नहीं रह सकेगी; किन्तु अनित्यत्व से युक्त को ही यदि साध्य मान लेते हैं, तो फिर उक्त (कृतकत्व हेतु में अपक्षधर्मत्वरूप) दोष की आपत्ति नहीं होती है । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि-