वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 542, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५७७ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्रासिद्धश्चतुर्विधः- उभयासिद्धः, अन्यतरासिद्धः, तद्भावासिद्धः, अनुमेयासिद्धश्चेति । तत्रोभयासिद्ध उभयोर्वादिप्रतिवादिनोःसिद्धः, यथाऽनित्यः शब्दः, सावयवत्वादिति । अन्यतरासिद्धो यथा- २. अन्यतरासिद्ध, ३. तद्भावासिद्ध और ४. अनुमेयासिद्ध भेद से 'असिद्ध' चार प्रकार के हैं । इनमें जो हेतुवादी और प्रतिवादी दोनों में से किसी के द्वारा पक्षादि में सिद्ध न हो उसे 'उभयासिद्ध' हेत्वाभास कहते हैं । जैसे कि शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए प्रयुक्त 'सावयवत्वात्' इस वाक्य से बोध्य सावयवत्व हेतु (उभयासिद्ध हेत्वाभास) है । शब्द में अनित्यत्व के साधन के लिए ही यदि कार्यत्व हेतु का कोई प्रयोग करे तो वह 'अन्यतरासिद्ध' हेत्वाभास होगा; क्योंकि वादी (वैशेषिक) ही शब्द को कार्य मानते हैं । प्रतिवादी (मीमांसक) उसे कार्य नहीं मानते । न्यायकन्दली मुक्तम् । तत्समानजातीये च प्रसिद्धमित्यनेन विरुद्धानध्यवसितवचनयोरनपदेशत्वम् । तद्विपरीते नास्त्येवेत्यनेन सन्दिग्धवचनस्यानपदेशत्वमिति विवेकः । एषामसिद्धविरुद्धसन्दिग्धानध्यवसितानां मध्ये असिद्धं कथयति- तत्रासिद्धश्चतुर्विध उभयासिद्ध इत्यादि । तत्रोभयासिद्धः - उभयोर्वादिप्रतिवादिनोरसिद्धः, यथाऽनित्यः शब्दः, सावयवत्वादिति शब्दे सावयवत्वं न वादिनो नापि प्रतिवादिनः सिद्धमित्युभयासिद्धः । के द्वारा 'विरुद्धवचन' और 'अनध्यवसितवचन' इन दोनों का हेत्वाभास व्यञ्जित होता है । एवं 'तद्विपरीते च नास्त्येव' इस वाक्य के द्वारा 'सन्दिग्धवचन' की हेत्वाभासता ध्वनित होती है । 'तत्रासिद्धश्चतुर्विधः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इन असिद्ध, विरुद्ध, सन्दिग्ध और अनध्यवसितों में से असिद्ध नाम के हेत्वाभास का विवरण देते हैं । इनमें वादी और प्रतिवादी ये दोनों ही जिस हेतु की सत्ता पक्ष में न मानते हों, वह हेतु 'उभयासिद्ध' नाम का हेत्वाभास है । जैसे कि 'शब्दोऽनित्यः सावयवत्वात्' इस अनुमान का सावयवत्व हेतु उभयासिद्ध हेत्वाभास है । इस अनुमान के प्रयोग करनेवाले (नैयायिकादि) हैं वादी, वे भी शब्द को सावयव नहीं मानते एवं शब्द को नित्य माननेवाले मीमांसक हैं प्रतिवादी, वे भी शब्द को द्रव्य मानते हुए भी सावयव नहीं मानते, अतः उक्त सावयवत्व हेतु 'उभयासिद्ध' हेत्वाभास है ।