भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका ५१ सत्त्व-दशा में पटत्वेन पट के रहते हुए भी बहिर्वृत्तित्वेन पट का अभाव रहता है । एवं जिस समय घट में पट तो है, किन्तु घट नहीं है, उस समय केवल घट के रहने पर भी घट-पट दोनों नहीं हैं । अतः पटत्वेन पट की सत्ता घट में रहने पर भी घटपटोभयत्वेन पट की सत्ता नहीं है; क्योंकि ऐसा तो नहीं कह सकते कि घट है इसलिए घट और पट दोनों ही हैं । अतः उभयाभाव के एक प्रतियोगी के रहने पर भी उभयत्वेन उसी प्रतियोगी का अभाव रहता है । इसको ही 'एकसत्त्वेऽपि द्वयं नास्ति' इस वाक्य के द्वारा व्यवहार करते हैं । इस प्रकार सम्बन्ध के द्वारा और धर्म के द्वारा अभावों में वैलक्षण्य होता है । किन्तु प्रतियोगिता के द्वारा ही अभावों में वैलक्षण्य आ सकता है । अतः यह कहा जाता है कि अभाव की प्रतियोगितायें किसी सम्बन्ध से एवं किसी धर्म से नियमित (अविच्छिन्न) होती हैं । जो प्रतियोगिता जिस सम्बन्ध से एवं जिस धर्म से अविच्छिन्न (नियमित) होगी, वही सम्बन्ध और वही धर्म उस प्रतियोगिता का अवच्छेदक होगा । जैसे कि 'समवायेन घटो नास्ति' इस अभाव की प्रतियोगिता समवाय सम्बन्ध और घटत्व धर्म से अवच्छिन्न है । अतः उक्त अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक सम्बन्ध समवाय है और प्रतियोगितावच्छेदक धर्म घटत्व है । तदनुसार नवीन नैयायिक 'समवायेन घटो नास्ति' इस वाक्य का अर्थ करते हैं- "समवायसम्बन्धावच्छिन्नघटत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावोऽस्ति" । सम्बन्ध को अभाव का प्रतियोगितावच्छेदक मानने में यह युक्ति है कि सामान्यतः किसी भी वस्तु का अभाव कहीं भी नहीं है । अन्ततः कालिक सम्बन्ध से सभी वस्तुएँ सभी जगह वर्तमान हैं । अतः जब भी किसी वस्तु का अभाव कहीं व्यवहृत होता है, तो उसके मध्य में कोई विशेष प्रकार का सम्बन्ध कार्य करता रहता है । सम्बन्ध का यह कार्य प्रतियोगिता में वैलक्षण्य सम्पादन के द्वारा ही हो सकता है और किसी प्रकार नहीं । जिस सम्बन्ध से जो वस्तु जहाँ नहीं है, वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता में और अभाव की प्रतियोगिताओं से वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अतः वही सम्बन्ध उस अभाव की प्रतियोगिता का 'अवच्छेदक' है । एवं वह प्रतियोगिता उस सम्बन्ध से अवच्छिन्ना होती है । जैसे कि भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए 'समवायेन घटो नास्ति' इस प्रकार का जो अभाव रहता है, उस अभाव की प्रतियोगिता में समवाय सम्बन्ध ही (संयोगसम्बन्धावच्छिन्नघटनिष्ठप्रतियोगिता की अपेक्षा) वैलक्षण्य का सम्पादन करता है । अगर समवाय सम्बन्ध उक्त प्रतियोगिता में वैलक्षण्य का प्रयोजक न हो, तो फिर घटनिष्ठ सभी प्रतियोगिताएँ समान रह जायेंगी । जिससे जिस प्रकार भूतल में संयोग सम्बन्ध से घट के रहते हुए 'संयोगेन घटो नास्ति' यह प्रतीति