वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६२० न्यायसहित/कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणेऽनुमानेऽवयव- प्रशस्तपादभाष्यम् तस्मात् पञ्चावयवेनैव वाक्येन परेषां स्वनिश्चितार्थप्रतिपादनं क्रियत इत्येतत्परार्थानुमानं सिद्धमिति । अतः पाँच अवयव वाक्यों से ही कोई समझानेवाला अपने निश्चित अर्थ को दूसरे को समझा सकता है । इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि पाँच अवयव वाक्य ही 'परार्थानुमान' हैं । न्यायकन्दली साध्यवाक्यार्थवादिनस्तु-निगमनस्येत्थमर्थवत्त्वं समर्थयन्ति-अन्यदेव घटस्य कृतकत्व- मन्यच्छब्दस्य, तत्र यदि नाम घटस्य कृतकत्वमनित्यत्वेन व्याप्तं किमेतावता शब्दगतेनापि तथा भवितव्यम् ? इति व्यामुह्यतो दर्शितयोरपि लिङ्गस्य पक्षधर्मत्वव्याप्त्यिभावयोः साध्य- प्रतीत्यभावे सति निगमनेन तस्मादिति सर्वनाम्ना सामान्येन प्रवृत्तव्याप्तिग्राहकं प्रमाण- मनुस्मार्य शब्दे अनित्यत्वं प्रतिपाद्यते, यस्माद् यत् कृतकं तदनित्यमिति सामान्येन प्रतीतं न विशेषतः, तस्मात् कृतकत्वेनानित्यः शब्द इति । एतस्मिन् पक्षे च प्रकरणसम- कालात्ययापदिष्टत्याभावः पक्षवचनेनैवोपदर्श्यते, असत्प्रतिपक्षत्वाबाधितविषयत्वयोः पक्ष- लक्षणत्वात् । साध्यवाक्यार्थवादिगण (निगमन को साध्य का ज्ञापक माननेवाले) निगमन की सार्थकता की पुष्टि इस प्रकार करते हैं कि (दृष्टान्तभूत) घट में रहनेवाला कृतकत्व और शब्द में रहनेवाला कृतकत्व दोनों भिन्न हैं । अतः कथित व्याप्ति और पक्षधर्मता को समझनेवाले पुरुष को भी यह भ्रान्ति हो सकती है कि घट में रहनेवाले कृतकत्व में अनित्यत्व की व्याप्ति के रहने पर भी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि शब्द में रहनेवाले कृतकत्व में भी अनित्यत्व की व्याप्ति है ही । इस प्रकार के पुरुष को (घट में रहनेवाले अनित्यत्व में कृतकत्व की व्याप्ति का ज्ञान रहने पर भी) शब्द में अनित्यत्व रूप साध्य की अनुमिति नहीं हो सकती । इसी के लिए 'तस्मात्' इत्यादि सर्वनामघटित निगमनवाक्य के द्वारा कृतकत्व सामान्य में अनित्यत्व सामान्य की व्याप्ति का स्मरण कराया जाता है, जिससे उसे भी शब्द में अनित्यत्व का ज्ञान हो । अभिप्राय यह है कि उक्त उदाहरण वाक्य से सामान्य रूप से ही यह प्रतीति होती है कि जितनी भी वस्तुयें कृति से उत्पन्न होती हैं, वे सभी अनित्य होती हैं । उदाहरण वाक्य का यह विशेष अभिप्राय ही नहीं है कि 'घट कृति से उत्पन्न होता है, अतः वही अनित्य है' । तस्मात् शब्द भी कृतिजन्य है, वह भी अनित्य है । इस मत में अबाधितत्व और असत्प्रतिपक्षितत्व हेतु के ये दोनों ही सामर्थ्य पक्षवचन (प्रतिज्ञावाक्य) से ही प्रदर्शित होते हैं; क्योंकि ये दोनों वस्तु पक्ष के स्वरूप के ही अन्तर्गत हैं ।