भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६२९ प्रशस्तपादभाष्यम् सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम्, कस्मात् ? प्रयत्नपूर्वकमञ्जन- पादलेपखड्गगुलिकादिसिद्धानां दृश्यद्रष्टॄणां सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टे- ष्वर्थेषु यद् दर्शनं तत् प्रत्यक्षमेव । अथ दिव्यान्तरिक्षभौमानां प्राणिनां (सिद्धजनों के अस्मदादि से विलक्षण ज्ञानरूप) 'सिद्धदर्शन' नाम का कोई (प्रत्यक्ष और अनुमिति से) भिन्न ज्ञान नहीं है; क्योंकि यत्नपूर्वक (विशेष प्रकार के) अञ्जन, पैर में विशेष प्रकार के लेप, खड्ग, गुलिका (आदि पद से मण्डूकवसाञ्जन) से (विशेषदर्शन का सामर्थ्यरूप) सिद्धि से युक्त पुरुषों को सूक्ष्म, व्यवहित एवं अत्यन्त दूर की वस्तुओं का जो (अस्मदादिविलक्षण) ज्ञान उत्पन्न होता है, वह प्रत्यक्ष ही है । दिव्यलोक, न्यायकन्दली तस्योत्पत्तिरनुपपन्ना कारणाभावादित्यनु(प)योगे सति इदमुक्तम्-धर्मविशेषादिति । विशिष्यत इति विशेषः, धर्म एव विशेषो धर्मविशेषः, विद्यातपःसमाधिजः प्रकृष्टो धर्मस्तस्मात् प्रतिभोदयः । तत्तु प्रस्तारेण बाहुल्येन देवर्षीणां भवति, कदाचिदेव लौकिकानामपि । यथा कन्यका ब्रवीति-श्वो मे भ्राताऽऽगन्तेति हृदयं मे कथयतीति । न चेदं संशयः, उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । न च विपर्ययः, संवादादतः प्रमाणमेव । सिद्धदर्शनमपि विद्यान्तरमिति केचिदिच्छन्ति तन्निवृत्त्यर्थमाह-सिद्ध- दर्शनं न ज्ञानान्तरम् । एतदेवोपपादयति-कस्मादित्यादिना । प्रयत्नपूर्वक- कहते हैं । इस प्रसङ्ग में कोई आक्षेप कर सकता है कि (यदि इन्द्रिय या लिङ्ग उसका कारण नहीं है तो फिर) कारण के न रहने से उसकी आपत्ति ही सम्भव नहीं है ? इसी आक्षेप का समाधान 'धर्मविशेषात्' इस वाक्य के द्वारा दिया गया है । 'विशिष्यत इति विशेषः, धर्म एव विशेषः धर्मविशेषः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विद्या, तपस्या और समाधि से उत्पन्न प्रकृष्टधर्म ही उक्त 'धर्मविशेष' शब्द का अर्थ है । इस प्रकृष्टधर्म से ही प्रातिभ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । 'तत्तु प्रस्तारेण' अर्थात् यह प्रातिभ ज्ञान 'प्रस्तार' से अर्थात् अधिकतर देवर्षियों को ही होता है । लौकिक व्यक्तियों (साधारण मनुष्यों) को कदाचित् ही होता है । जैसे कि कभी कोई बालिका कहती है कि 'मेरा मन कहता है, कल मेरे भैया आयेंगे' यह ज्ञान संशयरूप नहीं है; क्योंकि इसमें उभय कोटि का सम्बन्ध नहीं है । यह विपर्यय भी नहीं है; क्योंकि इस ज्ञान के अनुसार काम देखा जाता है । किसी सम्प्रदाय के लोग 'सिद्धदर्शन' नाम का एक अलग प्रमाज्ञान मानते हैं, उन लोगों के मत का खण्डन ही 'सिद्धदर्शनं न ज्ञानान्तरम्' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । 'कस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी का विवरण देते हैं । 'प्रयत्न-