वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३३ प्रशस्तपादभाष्यम् उपघातलक्षणं दुःखम् । विषाद्यनभिप्रेतविषयसान्निध्ये सत्यनिष्टोपलब्धी- न्द्रियार्थसन्निकर्षादधर्माद्यपेक्षादात्ममनसोः संयोगाद् यदमर्षोपघातदैन्यनिमित्त- मुत्पद्यते तद् दुःखम् । अतीतेषु सर्पव्याघ्रचौरादिषु स्मृतिजम् । अनागतेषु सङ्कल्पजमिति । उपघातस्वभाव अर्थात् प्रतिकूलवेदनीय ही दुःख है । वह विष प्रभृति अनभिप्रेत विषयों के सामीप्य, उनके साथ इन्द्रियों का संयोग एवं अधर्मसहकृत आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होता है । वह असहिष्णुता, दुःख का अनुभव एवं दीनता का कारण है । अतीत सर्प, व्याघ्र एवं चोर इत्यादि से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण उनकी स्मृतियाँ हैं । एवं भविष्य में आनेवाले विषयों से जो दुःख उत्पन्न होता है, उसका कारण उन (अनभिप्रेत) विषयों का सङ्कल्प है । न्यायकन्दली सङ्कल्पाज्जायते । यत्तु विदुषामात्मज्ञानवतामसत्सु विषयानुस्मरणसङ्कल्पेष्वसति विषयेऽसति चानुस्मरणे असति च सङ्कल्पे चाविर्भवति तद्विद्याशमसन्तोषधर्म विशेष- निमित्तमिति । विद्या आत्मज्ञानम्, शमो जितेन्द्रियत्वम्, सन्तोषो देहस्थितिहेतुमात्रातिरि- क्तानभिकाङ्क्षितत्वम्, धर्मविशेषः प्रकृष्टो धर्मो निवर्तकलक्षणः, एतच्चतुष्टयनिमित्तम् । ये तु दुःखाभावमेव सुखमाहुस्तेषामानन्दात्मानुभवविरोधः, हितमाप्स्यामि, अहितं हास्यामीति प्रवृत्तिद्वैविध्यानुपपत्तिश्च । सुखप्रत्यनीकतया तदनन्तरं दुःखं व्याचष्टे—उपघातलक्षणं दुःखम् । अनुभूत अतीत के साधनों में सुख की स्मृति से अनुराग उत्पन्न होता है । 'यह मुझे मिलेगा' इस आकार के संकल्प से सुख के भविष्य साधनों में अनुराग उत्पन्न होता है । 'विदुषाम्' अर्थात् आत्मज्ञानी विद्वानों में 'असद्विषयानुस्मरणसङ्कल्पेषु' अर्थात् विषयों के न रहने पर, अनुस्मरण के न रहने पर एवं सङ्कल्प के न रहने पर भी जो दिव्य सुख का आविर्भाव होता है, वह 'विद्याशमसन्तोषधर्मविशेषनिमित्तम्' अर्थात् विद्या, शम, सन्तोष और प्रकृष्ट धर्म ये सब उसके कारण हैं । 'विद्या' है तत्त्वज्ञान, 'शम' है इन्द्रियों का जय करना, जितने धन से शरीरयात्रा चले उससे अधिक धन की आकाङ्क्षा न करना ही 'सन्तोष' है । 'धर्मविशेष' शब्द से निवृत्तिरूप प्रकृष्टधर्म अभीष्ट है । इन चारों कारणों से आत्मज्ञानियों में उक्त सुख की उत्पत्ति होती है । जो सम्प्रदाय दुःखाभाव को ही सुख मानते हैं, उनके मत में इन दोषों की आपत्ति होगी । एक तो आनन्द का सभी जनों को जो अनुभव होता है, वह विरुद्ध होगा । एवं 'मैं हित को प्राप्त करूँ एवं अहित को छोड़ूँ' ये दो प्रकार की जो प्रवृत्तियाँ होती हैं, वे अनुपपन्न हो जायेंगी । दुःख सुख का विरोधी है, अतः सुख के निरूपण के बाद 'उपघातलक्षणं दुःखम्'