वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 604, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ६३९ न्यायकन्दली जीवनपूर्वक इति । सुप्तस्य प्राणापानक्रिया प्रयत्नकार्या क्रियात्वात् । न च तदानी- मिच्छाद्वेषौ प्रयत्नहेतू सम्भवतः, तस्माज्जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापानप्रेरको गम्यते । न केवलं जीवनपूर्वक एव प्रयत्नः प्राणापानप्रेरकः; किन्तु प्रबोधकालेऽन्तःकरण- स्येन्द्रियान्तरप्राप्तिहेतुश्च। विषयोपलम्भानुमितान्तःकरणेन्द्रियसंयोगः प्रयत्नपूर्वकान्तःकरण- क्रियाजन्यः, अन्तःकरणेन्द्रियसंयोगत्वात्, जाग्ररान्तःकरणेन्द्रियसंयोगवदिति। प्रयत्न- पूर्वकतासिद्धिः । अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः, धर्माधर्मपेक्ष आत्ममनसोः संयोगो जीवनम्, तस्मादस्योत्पत्तिरित्यर्थः । इतरस्तु इच्छाद्वेषपूर्वकश्च हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यायामस्य व्यापारस्य हेतुः शरीरविधारकश्च । गुरुत्वे सत्यपतः शरीरस्येच्छापूर्वकः प्रयत्नो विधारकः । स चात्ममनसोः संयोगादिच्छाद्वेषापेक्षादुत्पद्यते । हितसाधनोपादानेषु प्रयत्न इच्छापूर्वकः, दुःखसाधनपरित्यागे प्रयत्नो द्वेषपूर्वकः । हुए पुरुष की प्राणक्रिया और अपानक्रिया भी यतः क्रिया हैं, अतः वे भी प्रयत्न से ही उत्पन्न होती हैं । सोते समय की उन क्रियाओं की उत्पत्ति इच्छा और द्वेष से नहीं हो सकती, अतः यह सिद्ध होता है कि जीवनपूर्वक यत्न ही उन क्रियाओं का कारण है । जीवनपूर्वक प्रयत्न से केवल उक्त प्राणापानादि को प्रेरणा देनेवाली क्रियायें ही नहीं होती हैं; किन्तु उससे सोकर उठते समय मन का और इन्द्रिय का संयोग भी उत्पन्न होता है । विषय की उपलब्धि से अन्तःकरण का अन्य इन्द्रियों के साथ संयोग का अनुमान होता है । यह अन्तःकरण एवं अन्य इन्द्रियों का अनुमित संयोग भी जाग्रत् अवस्था के अन्तःकरण एवं इन्द्रियसंयोग की तरह अन्तःकरण और इन्द्रिय का संयोग ही है । अतः इसकी उत्पत्ति भी प्रयत्न से उत्पन्न अन्तःकरण की क्रिया से ही होती है । अतः प्रबोधकालिक अन्तःकरण और इन्द्रियों के प्रबोधकालिक संयोग का भी प्रयत्न से उत्पन्न होना सिद्ध होता है । 'अस्य जीवनपूर्वकस्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्माधर्मापेक्षादुत्पत्तिः' अर्थात् धर्म और अधर्म से उत्पन्न आत्मा और मन का संयोग ही जीवन है । इस जीवन से ही उक्त प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । 'इतरस्तु' अर्थात् (जीवनयोनि यत्न से भिन्न) इच्छा और द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न 'हिताहितप्राप्तिपरिहारसमर्थस्य व्यापारस्य हेतुः, शरीरविधारकश्च' । शरीर में (पतन के कारण) गुरुत्व के रहने पर भी जो शरीर का पतन नहीं होता है, उसमें इच्छाजनित प्रयत्न ही कारण है (इस प्रकार इच्छापूर्वक प्रयत्न विधारक है) । 'स चात्ममनसोः संयोगादिच्छाद्वेषापेक्षादुत्पद्यते' इनमें हित को साधन करनेवाली वस्तुओं के ग्रहण का इच्छा-जनित प्रयत्न कारण है एवं दुःख के कारणों को हटाने में द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न कारण है ।