वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे स्फोट- न्यायकन्दली प्रत्ययवद् वर्णसमुदायमात्रमवलम्बते । 'शब्दादर्थं प्रतिपद्यामहे' इति वर्णसमुदायमेवोरी- कृत्य लोकः प्रयुङ्क्ते । न च प्रत्यक्षेणाप्रतीयमानः प्रमाणान्तरतः शक्यो निरूपयितुम्, उपायाभावात् । अर्थप्रतीत्यन्यथानुपपत्तिस्तदुपाय इति चेत् ? किमप्रतीयमानः स्फोटोऽर्थाधिगमे हेतुः समर्थितो भवद्भिः ? प्रतीयमानो वा ? अप्रतीयमानस्य हेतुत्वे सर्वदार्थप्रतीतिप्रसङ्गः । प्रतीतिश्च तस्य नास्तीत्युक्तम्, अर्थप्रत्ययो वर्णानामेव तद्भावभावितामनुगच्छति, तेनैषामेव वरं व्युत्पत्त्यनुसारेणार्थप्रतिपादने कश्चिदुपाय आश्रीयताम्, न पुनरप्रतीयमानस्य गगन- कुसुमस्येव कल्पना युक्ता । न चेदं वाच्यं वर्णानां प्रतिपादकत्वे क्रमभेदे कर्तृभेदे व्यवधाने च प्रतीतिप्रसङ्ग इति । न हि ते विपरीतक्रमाः कर्तृभेदानुपातिनो देशकालव्यवहितास्त- दर्थधियः कारणम्, कार्योन्नेया हि शक्तयो भावानाम्, यथा तेभ्यः कार्यं दृश्यते, तथैव तेषां शक्तयः कल्प्यन्ते । यथोपद्दिशन्ति सन्तः - यावन्तो यादृशा ये च यदर्थप्रतिपादने । वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति । ही नहीं है । अर्थ की प्रतीति से वर्णों में ही उसके अन्वय और व्यतिरेक का आक्षेप होता है, अतः वर्णों से ही अर्थ की प्रतिपत्ति के लिए कोई उपाय ढूँढ़ निकालना ही युक्त है । यह अनुचित है कि इसके लिए आकाश-कुसुम की तरह सर्वथा अप्रतीत होनेवाले किसी (स्फोट रूप) अर्थ की कल्पना की जाय । (वर्णों से ही अर्थ का बोध मानने के पक्ष में) इन दोषों का उद्भावन करना अयुक्त है कि (प्र.) (वर्णों से ही यदि अर्थ की प्रतीति हो तो) (१) विभिन्न क्रम से पठित शब्दों से अर्थात् रस सर, वन नव, नदी दीन प्रभृति शब्दयुगलों से समान अर्थविषयक बोध की आपत्ति होगी; क्योंकि दोनों में समान ही वर्ण हैं । (२) एवं विभिन्न कर्त्ताओं से उच्चरित विभिन्न वर्णों से (अर्थात् देवदत्त से उच्चरित 'घ' और यज्ञदत्त से उच्चरित 'ट' शब्द से घटविषयक) बोध की आपत्ति होगी । एवं (३) व्यवहित वर्णों से (अर्थात् 'घ' के उच्चारण के बाद ककारादि वर्णों का उच्चारण और उसके बाद उच्चरित 'ट' वर्ण से) घटविषयक बोध की आपत्ति होगी । (उ.) ये आपत्तियाँ इसलिए नहीं हैं कि उक्त विभिन्न क्रमों से पठित या विभिन्न कर्त्ताओं से पठित या व्यवहित होकर पठित वर्णों को समान अर्थविषयक बोध का कारण ही नहीं मानते; क्योंकि किस प्रकार की वस्तुओं में किसकी कारणता है ? यह केवल कार्य से ही अनुमान किया जा सकता है । जिन वस्तुओं से जिन प्रकार के कार्यों की उत्पत्ति देखी जाती है, उन वस्तुओं को ही उन कार्यों का कारण माना जाता है । जैसा कि विद्वानों का उपदेश है कि "जितने एवं जिन वर्णों के जिस प्रकार के विन्यास में जिन अर्थों के बोध का सामर्थ्य (कार्य से) निश्चित है,