भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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६५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे संस्कार- प्रशस्तपादभाष्यम् प्रयत्नेन मनश्चक्षुषि स्थापयित्वाऽपूर्वमर्थं दिदृक्षमाणस्य विद्युतस्- प्रयत्न के द्वारा मन को चक्षु में सम्बद्ध कर विशेष प्रकार की वस्तु को देखने न्यायकन्दली संस्कारस्मरणयोरन्यतरसापेक्षोऽन्त्यो वर्णः प्रत्यायकः, यथा चानेकसंस्काराः सम्भूय स्मरणं जनयन्ति तथोपपादितं द्वित्वे । अथ मन्यसे वर्णविषयात् संस्कारादर्थप्रतीतिरयुक्ता, संस्कारा हि यद्विषयोपलम्भसम्भावितजन्मानस्तद्विषयानेव स्मृतिमाधातुमीशते न कार्यान्तरम् । यथाह मण्डनः स्फोटसिद्धौ- संस्काराः खलु यद्वस्तुरूपप्रख्याविभाविताः । फलं तत्रैव जनयन्त्यतोऽर्थे धीर्न कल्प्यते ॥ इति । तदप्यसमीचीनम् । यतः पदार्थप्रतीत्यनुगुणतया प्रत्येकमनुभवैराधीय- माना वर्णविषयाः संस्काराः स्मृतिहेतुसंस्कारविलक्षणशक्तय एवाधीयन्ते, के कारण हैं, वर्ण नहीं) । (उ.) यह कहना भी वर्ण को ही अर्थबोध का कारण माननेवाले प्रतिपक्षी के मत की आलोचना किये बिना ही मालूम होता है । यह ठीक है कि वर्ण चिरस्थायी नहीं हैं (क्षणिक हैं), फिर क्रमशः उत्पन्न उनके सभी संस्कार मिलकर पदार्थविषयक बोध को उत्पन्न करेंगे । अथवा ऐसा भी कह सकते हैं कि पहले-पहले वर्ण के संस्कार अथवा पहले-पहले वर्ण की स्मृति इन दोनों में से किसी एक के साहाय्य से केवल अन्तिम वर्ण से भी अर्थ का बोध मान सकते हैं । अनेक संस्कार मिलकर एक ही स्मरण का जिस रीति से सम्पादन करते हैं, वह रीति द्वित्वनिरूपण के प्रसङ्ग में लिख आये हैं । यदि यह कहना चाहते हों कि (प्र.) जिस विषयक अनुभव से जिस संस्कार की उत्पत्ति होगी, वह संस्कार उसी विषयक स्मृति को उत्पन्न कर सकता है, जिससे एक विषयक संस्कार से अपर विषयक स्मृतिरूप भी दूसरा कार्य नहीं हो सकता । अतः वर्णविषयक संस्कार से अर्थविषयक बोधरूप दूसरे कार्य की उत्पत्ति कैसे होगी ? (क्योंकि वर्णविषयक संस्कार से तो वर्णविषयक स्मृतिरूप कार्य ही उत्पन्न हो सकता है) । जैसा कि आचार्य मण्डन ने अपने 'स्फोटसिद्धि' नामक ग्रन्थ में कहा है कि 'संस्कार जिन विषयों की 'प्रख्या' अर्थात् अनुभव से उत्पन्न होंगे, उन्हीं विषयों में वे स्मृति को उत्पन्न कर सकते हैं, अतः वर्णविषयक संस्कारों से अर्थविषयक 'धी' अर्थात् बोध उत्पन्न नहीं हो सकता । (उ.) किन्तु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि (अन्यत्र स्मृति और संस्कार के कार्यकारणभाव में समानविषयत्व का नियम यद्यपि ठीक है; तथापि) पदों में या वाक्यों में प्रयुक्त होनेवाले वर्णों के हर एक अनुभव से आत्मा में जिस संस्कार का आधान होता है, वह संस्कार स्मृति के कारणीभूत संस्कारों से कुछ विलक्षण प्रकार का होता है, जिस संस्कार में पद के अर्थविषयक अनुभव कराने की शक्ति होती है, उस संस्कार के कार्य