वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 627, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें६६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म- न्यायकन्दली यथोक्तम्- फलाय विहितं कर्म क्षणिकं चिरभाविने । तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतदपूर्वमपि कल्प्यते ॥ अत्रोच्यते । न कर्मसामर्थ्यं क्षणिके कर्मणि समवेति, शक्तिमति विनष्टे निराश्रयस्य सामर्थ्यस्यावस्थानासम्भवात् । स्वर्गादिकं च फलं तदानीमनागतमेव, न शक्तेराश्रयो भवितुमर्हति । यदि त्यनुष्ठानानन्तरमेव स्वर्गो भवति ? अपूर्वकल्पनावैय्यर्थ्यम्, तदुप- भोगश्च दुर्निवारः । विशिष्टशरीरेन्द्रियादिविरहादननुभवश्चेत् ? तर्ह्ययं तदानीमनुपजात एव स्वर्गस्योपभोग्यैकस्वभावत्वात् । अनुपभोग्यमपि सुखस्वरूपमस्तीति अदृष्टकल्पनैव । तस्मान्न फलाश्रयमपूर्वम् । न चाकाशादिसमवेतादपूर्वादात्मगामिफलसम्भवः । वस्तुभूतं च कार्यमनाधारं नोपपद्यते, तस्मादात्मसमवेतस्यैव तस्योत्पत्तिरभ्युपेया । तथा सति न तत्कर्मसामर्थ्यं स्यात्, अन्यसामर्थ्यस्यान्यत्रासमवायात् । अथान्यत्राप्यन्यसमवेता शक्ति- रिष्यते, तस्याः कार्यानुमेयत्वादिति चेत् ? जैसा कहा गया है कि 'बहुत दिनों बाद होनेवाले स्वर्गादि फलों के लिए जो क्षण मात्र रहनेवाले यागादि का विधान किया गया है, वह विधान तब तक उपपन्न नहीं हो सकता, जब तक कि 'अपूर्व' की कल्पना न कर ली जाय। अतः 'अपूर्व' की कल्पना करते हैं । (उ.) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि यह कर्म का सामर्थ्यरूप अपूर्व (जिसे स्वर्गसाधन पर्यन्त रहना है) यागादि क्रियाओं में तो रह नहीं सकता; क्योंकि वे क्षणिक हैं । अतः उनके नाश हो जाने पर बिना आश्रय के अपूर्व (स्वर्गोत्पादन पर्यन्त) की अवस्थिति ही सम्भव नहीं है । स्वर्गादि फल भी अपूर्व के आश्रय नहीं हो सकते; क्योंकि अपूर्व की उत्पत्ति के समय स्वर्गादि भविष्य के गर्भ में ही रहते हैं । यदि यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त बाद ही स्वर्गादि की उत्पत्ति (आश्रय को उपपन्न करने के लिए) मानें, तो उनका उपयोग भी (उसी समय) मानना पड़ेगा । यदि ऐसा कहें कि उस समय (यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त बाद) स्वर्गादि भोगों के उपयुक्त शरीर या इन्द्रियाँ नहीं हैं, इसी से स्वर्ग की उत्पत्ति नहीं होती है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि स्वर्गादि उस समय उत्पन्न ही नहीं होते, क्योंकि स्वर्गादि उपभोगस्वभाव के ही हैं । यह कल्पना अभूतपूर्व होगी कि स्वर्ग की सत्ता तो उस समय भी है, किन्तु वह स्वर्ग उपभोग्य नहीं है । यह भी सम्भव नहीं है कि (पुरुष से भिन्न) आकाशादि कोई भी वस्तु उसके आश्रय हों; क्योंकि आकाशादि में रहनेवाले अपूर्व से आत्मा में स्वर्ग की उत्पत्ति नहीं हो सकती । यह भी सम्भव नहीं है कि अपूर्व रूप कार्य की उत्पत्ति बिना आश्रय के ही हो; क्योंकि वह भावरूप कार्य है । अतः अपूर्व को यदि मानना है, तो उसकी उत्पत्ति आत्मा में ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) हम यह भी मान लेंगे कि एक वस्तु की ऐसी भी शक्ति हो सकती है, जो समवाय सम्बन्ध से दूसरी वस्तु में रहे; क्योंकि शक्ति की सत्ता तो उससे उत्पन्न कार्यरूप