भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१ न्यायकन्दली गृहस्थस्य धर्मसाधनम् । भूतेभ्यो बलिप्रदानं भूतयज्ञः । अतिथिपूजनं मनुष्ययज्ञः । होमो देवयज्ञः । श्राद्धं पितृयज्ञः । ब्रह्मयज्ञो वेदपाठः । एकाग्निविधानेन पाकयज्ञ- संस्थानामिति । अनुष्ठानम् । एकाग्निरिति औपासनिकः । तस्य विधानं विवाहकाले परिग्रहः । तेन पाकयज्ञसंस्थानां पाकयज्ञविशेषाणामष्टकापार्वणीचैत्र्याश्वयुज्यादीनां नित्यानामवश्यकरणीयानां सति सामर्थ्येऽनुष्ठानम् । अग्न्याधेयादीनामिति । अनुष्ठानं धर्मसाधनम्, अग्न्याधेयशब्देनाग्न्याधानस्याभिधानम्, यद् ब्राह्मणेन वसन्ते क्रियते । हविर्यज्ञसंस्था हविर्यज्ञविशेषा दर्शपूर्णमासचातुर्मास्याग्रायणादिका इष्टयः कथ्यन्ते । अग्निष्टोमादीति अग्निष्टोमोक्थ्यषोडशीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामाः सप्तसोमयज्ञविशेषाः सोमयज्ञसंस्था उच्यन्ते । ऋत्वन्तरेष्विति । ऋतुकालादन्यकालेषु ब्रह्मचर्यं व्रतरूपेण स्त्री- सेवापरिवर्जनं धर्मसाधनम् । अपत्योत्पादनमपि धर्मसाधनम्, पुत्रेण लोकाञ्जयतीति श्रुतेः । दूसरों से प्रतिग्रह न लेकर बारी-बारी से प्रत्येक आँगन में भिक्षा माँगने को 'यायावरवृत्ति' कहते हैं। इन दोनों वृत्तियों से ही उपार्जित धन के द्वारा सायङ्काल, प्रातःकाल और अपराह्नकाल में पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान गृहस्थों के लिए धर्म का साधन है । काकादि प्राणियों के लिए बलि देने को 'भूतयज्ञ' कहते हैं । अतिथियों की पूजा को ही 'मनुष्ययज्ञ' कहते हैं। होम ही 'देवयज्ञ' है । श्राद्ध को 'पितृयज्ञ' कहते हैं । वेदों का पाठ ही 'ब्रह्मयज्ञ' है । 'एकाग्निविधानेन पाकयज्ञसंस्थानाम्' अर्थात् इनके अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं । 'एकाग्नि' शब्द से औपासनिक अग्नि को समझना चाहिए, जिसका ग्रहण विवाह के समय किया जाता है । उस अग्नि के द्वारा 'पाकयज्ञसंस्था' के होमों का अर्थात् अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य एवं आश्वयुज्य प्रभृति नित्यकर्मों का अर्थात् अवश्य- करणीय कर्मों का सामर्थ्य रहने पर जो अनुष्ठान (वे भी धर्म के साधन हैं), 'अग्न्याधेयादीनाम्' अर्थात् अग्न्याधेयादि के अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं । 'अग्न्याधेय' शब्द से अग्नि का आधान समझना चाहिए, जो वसन्त के समय ब्राह्मणों के द्वारा अनुष्ठित होता है । 'हविर्यज्ञसंस्था' शब्द से विशेष प्रकार के दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रायण प्रभृति इष्टियाँ कही जाती हैं । 'अग्नि ष्टोमादीति' अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ये विशेष प्रकार के सात सोमयज्ञ ही 'सोमयज्ञसंस्था' कहलाते हैं । 'ऋत्वन्तरेषु' स्त्री के ऋतुकाल से भिन्न समय में व्रतरूप से 'ब्रह्मचर्य' का अर्थात् स्त्रीसङ्ग का त्याग भी धर्म का साधन है । पुत्र को उत्पन्न करना भी धर्म का साधन है; क्योंकि 'पुत्रेण लोकान् जयति' यह श्रुति है ।