भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भाषानुवादसहितम् ६८९ न्यायकन्दली तन्निवृत्तौ तत्कार्यस्य तत्त्वज्ञानस्यापि विनाशादात्मा कैवल्यमापद्यते । तत्रात्मतत्त्व- ज्ञानस्य विहितानां च कर्मणां बन्धहेतुकर्मप्रतिबन्धव्यापारदस्ति सम्भूयकारिता । शरीरादि- विविक्तमात्मानं जानतश्च तदुपकारापकारावात्मन्यप्रतिसन्दधानस्याहङ्कारममकारयोरु- परमे सत्युपकारिण्यपकारिणि च रागद्वेषयोरभावादुदासीनस्याप्रवृत्तावनागतयोः कुशलेतर- कर्मणोरसञ्चयात्, सञ्चितयोश्चोपभोगेन कर्मभिश्च परिक्षयाद् विहिताकरणनिमित्तस्य प्रत्यवायस्य च विहितानुष्ठानेनैव प्रतिबन्धात् । क्षीणे कर्मण्यैहिकस्य देहस्य निवृत्तौ कारणान्तराभावादानुष्मिकस्य देहस्य पुनरुत्पत्त्यभावे सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानम् । यथोक्तम्- नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् । ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन तु पाचयेत् ॥ अभ्यासात् पक्वविज्ञानः केवल्यं लभते नरः ॥ इति । तथा परैरप्ययं गृहीतो मार्गः- कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानेनात्मविनिश्चयः । भवेद् विमुक्तिरभ्यासात् तयोरेव समुच्चयात् ॥ इति । इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञान और विहित कर्मों का अनुष्ठान ये दोनों मिलकर (ज्ञानकर्मसमुच्चय) ही बन्ध के कारणीभूत कर्मों का प्रतिरोध करने की क्षमता रखते हैं । जिस पुरुष को 'शरीरादि से आत्मा भिन्न है' इस प्रकार का ज्ञान और शरीरादि में किये गये उपकार और अपकार को आत्मा का उपकार और अपकार न समझने की बुद्धि है, उस पुरुष के अहङ्कार और ममकार का विलोप हो जाता है । फिर उपकारी के प्रति राग और अपकारी के प्रति द्वेष ये दोनों भी स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जिससे आत्मा की प्रवृत्ति रुक जाती है और वह उदासीन हो जाता है । जिससे आगे पाप और पुण्य का प्रवाह रुक जाता है और पहले किये गये (सञ्चित) पाप-पुण्य का भोग और दूसरे कर्मों से विनाश हो जाता है । एवं विहित कर्मों के न करने से जो प्रत्यवाय होगा, उसका प्रतिरोध विहित कर्मों के अनुष्ठान से ही हो जाएगा । इस प्रकार सभी कर्मों का विनाश हो जाने पर इहलोक का शरीर तो नष्ट हो ही जायेगा और कारणों के न रहने पर पारलौकिक शरीर भी उत्पन्न नहीं होगा । ऐसी स्थिति में आत्मा अपने स्वरूप में स्थित हो जाएगा । जैसा कहा गया है कि- नित्य और नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान से सभी पापों को नष्ट करते हुए ज्ञान को स्वच्छ कर लेना चाहिए । इसके बाद अभ्यास के द्वारा उक्त स्वच्छ ज्ञान को परिपक्व कर लेना चाहिए । इस प्रकार अभ्यास से परिपक्व ज्ञान वाले पुरुष को ही कैवल्य प्राप्त होता है । अन्य सम्प्रदाय के लोगों ने भी इस मार्ग को अपनाया है, जैसा कि इस श्लोक से स्पष्ट है- कर्म से अन्तःकरण की शुद्धि होती है और ज्ञान से आत्मा का (साक्षात्कारत्मक) विनिश्चय होता है । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों के ही अभ्यास से मुक्ति प्राप्त होती है ।