वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 676, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१५ प्रशस्तपादभाष्यम् नामवरोधार्थं गमनग्रहणं कृतमिति । अन्यथा हि यान्येव चत्वारि विशेषसंज्ञोक्तानि तान्येव सामान्यविशेषसंज्ञाविषयाणि प्रसज्येरन्निति । अथवा अस्वपरं सामान्यं गमनत्वम्, अनियतदिग्देश- न होनेवाले भ्रमण, पतन, स्पन्दनादि क्रियाओं के संग्रह के लिए ही 'गमन' शब्द का उपादान किया गया है । यदि ऐसी बात न होती—भ्रमणादि क्रियाओं के संग्रह के लिए 'गमन' शब्द का उपादान न किया जाता—तो जो भी चार कर्म उत्क्षेपण, अपक्षेपण, आकुञ्चन और प्रसारण इन चार नामों से कहे गये हैं, उतने ही कर्म समझे जाते (फलतः उत्क्षेपणादि चार क्रियाओं से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं का अभाव ही समझा जाता) । अथवा (कर्मत्व से भिन्न) गमनत्व नाम का अलग सामान्य ही मान लें, जो अनियमित दिशाओं और अनियत देशों में संयोगों और विभागों के उत्पादक न्यायकन्दली उत्तरमाह-नेति । उत्क्षेपणादिशब्दैरनवरुद्धा न संगृहीता भ्रमणादयः । यदि गमन- ग्रहणं न क्रियेत, तदा तेषां कर्मत्वेन सङ्ग्रहो न स्यात्; किन्तु विशेषसंज्ञयो- द्विष्ठानामुत्क्षेपणादीनामेव परं कर्मत्वसंज्ञाविषयत्वं भवेत् । भ्रमणादयोऽपि च कर्मत्वेन लोकप्रसिद्धाः, अतस्तेषां परिग्रहार्थं पृथग् गमनग्रहणं कृतमिति ग्रन्थार्थः । अथवा अस्वपरं सामान्यं गमनत्वम्, तत् केषु वर्तते, तत्राह-अनियतेति । पङ्क्ति से पूर्वपक्षी यह आक्षेप करते हैं कि (उत्क्षेपणादि की तरह) विशेष नाम के द्वारा गमन का उल्लेख क्यों किया गया है ? 'न' इत्यादि से इसी आक्षेप का उत्तर दिया है । अर्थात् यदि गमन शब्द का उल्लेख (उत्क्षेपणादि शब्दों की पङ्क्ति में) न किया जाता तो जिन भ्रमणादि क्रियाओं का अवरोध (संग्रह) उत्क्षेपणादि शब्दों के द्वारा सम्भव नहीं है, उस सबों का कर्म में संग्रह न हो सकता । (गमनशब्दघटित उक्त वाक्य से केवल) उत्क्षेपणादि क्रियाओं का ही संग्रह होता; किन्तु उत्क्षेपणादि से भिन्न भ्रमणादि क्रियाओं में भी कर्मत्व का व्यवहार लोक में होता है । अतः उन सबों के संग्रह के लिए ही 'गमन' शब्द का उल्लेख किया गया है । यही उक्त (सिद्धान्त भाष्य) ग्रन्थ का अभिप्राय है । 'अथवा अस्वपरं सामान्यं गमनत्वम्' (अर्थात् गमनत्व को भी उत्क्षेपणादि की तरह कर्मत्व का अवान्तर सामान्य ही मान लें, तब भी कोई क्षति नहीं है) । यह गमनत्व (कर्मत्वव्याप्य) जाति किन कर्मों में रहती है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'अनियत' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । तो फिर उत्क्षेपणादि कर्मों में गमन की प्रतीति