भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७१७ प्रशस्तपादभाष्यम् करोति । यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टस्तथापि मुसलोलूखलयोः संयोगः पटुकर्मोत्पादकः संयोगविशेषभावात् तस्य संस्कारारम्भे साचिव्यसमर्थो भवति । अथवा प्राक्तन एव पटुः संस्कारोऽभिघाताद- संस्कार के उत्पादन का मुख्य अधिष्ठाता है । अथवा पहले का ही विशेष कार्यक्षम संस्कार अभिघात नाम के संयोग से नष्ट न होने के कारण न्यायकन्दली संयोगोऽसमवायिकारणभूतोऽप्रत्ययमप्रयत्नपूर्वकं हस्तेऽप्युत्पतनकर्म करोति । योऽसौ प्राक्तनोऽपक्षेपणसंस्कारो मुसलगूर्तः सोऽप्यभिघाताद् विनष्टः, तदभावे कथं मुसलेऽ- प्रत्ययमयुत्पतनकर्मोत्पतनसंस्कारमारभते ? अपेक्षाकारणाभावाद् अत आह-यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टः, तथापि मुसलोलूखलसंयोगः पटुकर्मोत्पादकः संस्कारजनककर्मो- त्पादकः । कुतः ? संयोगविशेषभावात् संयोगविशेषत्वात् । किमतो यद्येवम् ? तत्राह-- तस्य कर्मणः संस्कारारम्भे कर्तव्ये साचिव्यसमर्थो भवति, साहाय्ये समर्थो भवति । अस्मिन् पक्षे हस्तमुसलयोरुत्पतनकर्मणी क्रमेण भवतः । आशुभावाच्च यौगपद्यग्रहणम् । प्रकारान्तरमाह-अथवा प्राक्तन एव पटुः, संस्कारोऽभिघातादविनश्यन्न- वस्थित इति विशिष्टकारणजत्वात्प्रतिबलः संस्कारः स्पर्शवद्द्रव्यसंयोगेनापि अभिघातसंयोग के द्वारा विनष्ट हो चुका है । उस संस्कार के न रहने पर मूसल की वह प्रयत्ननिरपेक्ष क्रिया मूसल में उत्पन्नक्रिया से उत्पन्न होनेवाले संस्कार को कैसे उत्पन्न कर सकती है ? क्योंकि (प्राक्तन संस्काररूप) आवश्यक कारण वहाँ नहीं है । इसी प्रश्न का समाधान 'यद्यपि प्राक्तनः संस्कारो विनष्टः' इत्यादि से दिया गया है । इस सन्दर्भ के 'पटुकर्मोत्पादकः' इस वाक्य के द्वारा यह कहा गया है कि (मूसल और उलूखल का संयोग) ऐसे कर्म का उत्पादक है कि जिसमें (वेगाख्य) संस्कार को उत्पन्न करने की शक्ति है । कुतः ? अर्थात् संयोग में ही संस्कार की कारणता क्यों है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'संयोगविशेषभावात्' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् यतः वह संयोग अन्य संयोगों से विशेष प्रकार का है (अतः उससे संस्कार की उत्पत्ति होती है) । उक्त संयोग में यदि विशिष्टता है भी तो इसका प्रकृत में क्या उपयोग है ? इसी प्रश्न का उत्तर 'तस्य संस्कारारम्भे' इत्यादि से दिया गया है । अर्थात् उस संयोग में यही विशिष्टता है कि उसमें कर्म के द्वारा वेग (संस्कार) के उत्पादन में साहाय्य करने का सामर्थ्य है । इस पक्ष में हाथ में और मूसल में उत्पतन क्रियायें क्रमशः उत्पन्न होती हैं (युगपत् नहीं) । 'हस्तमुसलयोर्युगपद- पक्षेपणकर्मणी' इत्यादि वाक्य में जो यौगपद्य का ग्रहण किया गया है, उसका अर्थ केवल शीघ्रता है (अर्थात् दोनों में अतिशीघ्र उत्पतन कर्म की उत्पत्ति होती है । 'अथवा प्राक्तन एव पटुः संस्कारोऽभिघातादविनश्यन्नवस्थित इति' इस सन्दर्भ के द्वारा उक्त प्रश्न का ही दूसरे प्रकार से समाधान किया गया है । अभिप्राय