वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 695, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ें७३० न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धत्यादवयविद्रवत्वस्य कार्या- रम्भो नास्ति । सेतुसमीपस्थस्यावयवद्रवत्वस्योत्तरेषामवयव- द्रवत्यानां प्रतिबन्धकाभावाद् वृत्तिलाभः । ततः क्रमशः संयुक्ताना- जाता है, उस समय सभी किनारों के साथ संयुक्त रहने के कारण अवयवी के द्रवत्व प्रतिरुद्ध रहते हैं, अतः अपना (स्यन्दन) क्रियारूप काम नहीं कर सकते । अतः कोई प्रतिबन्ध न रहने के कारण बाँध के समीप में रहनेवाले जलावयवों के द्रवत्व ही अपने कार्य करने को उन्मुख रहते हैं । उसके बाद बाँध से संयुक्त जलावयवों में ही 'अपसर्पण' (नीचे की तरफ फैलने की) क्रियाओं की उत्पत्ति होती है । इसके बाद पहले द्रव्य का न्यायकन्दली समन्तात् सर्वतो रोधःसंयोगे कूलसंयोगे सति अवयविनो द्रवत्वं प्रतिबद्धं स्यन्दनं वा न करोति । अवयवद्रवत्वमप्येकार्थसमवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्, यस्मिन्नवयवे साक्षाद् रोधःसंयोगोऽस्ति तदवयवगतद्रवत्वं तेनैव रोधःसंयोगेन प्रतिबद्धम्, उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि, रोधःसंयुक्तेनावयवेन सह संयोगादय- म्वान्तरस्य द्रवत्वं प्रतिबद्धमिति । तत्संयोगादपरस्य प्रतिबद्धमित्यनेनैव न्यायेनोत्तरोत्तर- द्रवत्वानि प्रतिबद्धानि । यदा तु मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति, तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्यारम्भो नास्ति, दीर्घतरेण सेतुना समन्तात् प्रतिबद्ध- स्यावयविनो महापरिमाणस्यैकदेशकृतेनाल्पीयसा मार्गेण निर्गमाभावात् । सेतुसमीपस्थस्य 'समन्तात्' अर्थात् सभी कूल के अवयवों में 'रोधःसंयोगेन' दोनों किनारे के साथ जल का संयोग उसके द्रवत्व को प्रतिरुद्ध कर देता है । 'अवयवद्रवत्वमप्येकार्थ- समवेतं तेनैव प्रतिबद्धम्' जिस अवयव का किनारे के साथ साक्षात् संयोग है, उस अवयव में रहनेवाला द्रवत्व भी अवयव और किनारे के संयोग से ही प्रतिरुद्ध हो जाता है । 'उत्तरोत्तराणि त्ववयवद्रवत्वानि संयुक्तसंयोगैः प्रतिबद्धानि' अर्थात् किनारे से संयुक्त अवयव के साथ संयोग के कारण ही अन्य अवयवों का द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होता है । उस अन्य अवयव के संयोग से तीसरे अवयव का द्रवत्व प्रतिरुद्ध होता है । इसी रीति से अन्य अवयवों के द्रवत्व भी प्रतिरुद्ध होते हैं । 'यदा मात्रया सेतुभेदः कृतो भवति तदा समन्तात् प्रतिबद्धस्यावयविद्रवत्वस्य कार्या- रम्भो नास्ति' क्योंकि बहुत बड़े बाँध से घिरे हुए उस महत् परिमाणवाले अवयवी रूप जल का किसी एक ओर बनाये गये छोटे मार्ग से निकलना सम्भव नहीं है; किन्तु उस बाँध के समीप में जो थोड़े से जल के अवयव हैं, उनका उस छोटे से मार्ग से निकलना सम्भव है । इस प्रकार जल के कुछ अवयवों