भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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भूमिका [ प्रथम संस्करण की ] न्यायकन्दली सहित प्रशस्तपादभाष्य का हिन्दी अनुवाद तथा टिप्पणियों के साथ पण्डितों के समक्ष उपस्थित करते हुए मुझे विशेष हर्ष हो रहा है। हर्ष दो कारणों से है- (१) वर्तमानकाल में दुर्लभ इस टीका के साथ प्रशस्तपादभाष्य की पुस्तक मूल संस्कृत पुस्तकों के चाहनेवालों के लिए सुलभ हो जायगी । (२) एवं प्रशस्तपादभाष्य और न्यायकन्दली का अर्थ हिन्दी संसार के सामने स्पष्ट हो जायगा । पुस्तक का सम्पादक हो या अनुवादक, सब के लिए यह अलिखित कर्त्तव्य निर्दिष्ट-सा हो गया है कि पुस्तक के साथ वह कोई भूमिका अवश्य लिखे । तदनुसार मैं भी एक भूमिका लिख रहा हूँ । शास्त्रों के ज्ञान-लाभ करने के लिए पद और पदार्थों का सम्यक् ज्ञान आवश्यक है । इनमें पद-ज्ञान के लिए जिस प्रकार व्याकरणशास्त्र की शरण लेना अनिवार्य है, उसी प्रकार पदार्थज्ञान के लिए कणादनिर्मित इस दर्शन की भी आवश्यकता है । वैशेषिकदर्शन की इस आवश्यकता को "काणादं पाणिनीयञ्च सर्वशास्त्रोपकारकम्" इत्यादि उक्तियाँ भी समर्थन करती हैं। अतएव वैशेषिक- दर्शन की उपादेयता में तो कोई सन्देह ही नहीं है । वैशेषिकदर्शन और इसके सूत्र इसके तीन नाम अधिक प्रसिद्ध हैं-(१) वैशेषिकदर्शन, (२) औलूक्यदर्शन और (३) काणाददर्शन । इनमें 'वैशेषिक' नाम के प्रसङ्ग में ६ प्रकार की युक्तियाँ प्रचलित हैं-(१) 'अन्यत्र अन्त्येभ्यो विशेषेभ्यः' (१।२।६) इस सूत्र के अनुसार 'अन्त्य' विशेष पदार्थ के साथ सम्बद्ध जो 'दर्शन' वही 'वैशेषिकदर्शन' है; क्योंकि दूसरे किसी भी दर्शन में इस प्रकार का 'विशेष' पदार्थ स्वीकृत नहीं है । अतः 'विशेष' रूप स्वतन्त्र पदार्थ के निरूपण के द्वारा यह अन्य दर्शनों से अलग समझा जा सकता है । अतः दूसरे दर्शनों से इसको अलग समझानेवाली यह 'वैशेषिकदर्शन' संज्ञा है । (२) न्यायदर्शन में दुःखों की पूर्ण निवृत्ति को 'मोक्ष' कहा गया है । इस दर्शन में आत्मा के सभी विशेष गुणों के पूर्ण विनाश को 'अपवर्ग' माना गया है । अतः सभी दर्शनों के द्वारा समान प्रतिपाद्य मोक्ष के प्रसङ्ग में यह 'विशेषगुण' का

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