भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३५ प्रशस्तपादभाष्यम् च क्रिया, सा चाकाशादिषु नास्ति । तस्मान्न तेषां क्रियासम्बन्धोऽस्तीति । सविग्रहे मनसीन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं जाग्रतः कर्म आत्ममनः- संयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षात्, अन्यभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषया- परिमाण को 'मूर्त्ति' कहते हैं । यह 'मूर्त्ति' जहाँ रहती है, क्रिया वहीं होती है । यह (मूर्त्ति) आकाशादि द्रव्यों में नहीं है, अतः उनमें क्रिया का सम्बन्ध भी नहीं है । शरीर के सम्बन्ध से युक्त जागते हुए व्यक्ति के मन की क्रिया आत्मा और मन के संयोग से उत्पन्न होती है, जिसमें उसे इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न के साहाय्य की भी आवश्यकता होती है; क्योंकि न्यायकन्दली नास्ति, अतः क्रियावत्त्वमपि न वियत इत्यर्थः । एतदेव विवृणोति- मूर्त्तिरित्यादिना । तद् व्यक्तम् । मनसि कर्मकारणमाह-सविग्रह इति । जाग्रतः पुरुषस्य सविग्रहे मनसि सशरीरे मनसी- न्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म आत्ममनःसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षाद् भवति । इच्छाद्वेष- पूर्वकः प्रयत्नो जाग्रतो मनसि क्रियाहेतुरिति । कथमेतदवगतं तत्राह- अन्यभिप्रायमिन्द्रिया- न्तरेण विषयोपलब्धिदर्शनात् । जागरावस्थायामभिप्रायमनतिक्रमेणेन्द्रियान्तरेण चक्षुरादिना विषयोपलब्धिर्दृश्यते । यदा रूपं जिघृक्षते पुरुषस्तदा रूपं पश्यति, यदा रसं जिघृक्षते तदा रसं रसयति । न चान्तःकरणसम्बन्धमन्तरेण बाह्येन्द्रियस्य विषयग्राहकत्व- प्रकार आकाश, काल, दिक् और आत्मा इन चार महान् द्रव्यों में भी क्रिया की उत्पत्ति का विचार क्यों नहीं किया गया ? इस प्रश्न के उत्तरग्रन्थ का अभिप्राय है कि यह व्याप्ति है कि क्रिया मूर्त द्रव्यों में ही रहे । आकाशादि कथित चारों द्रव्य मूर्त नहीं हैं, अतः उनमें क्रिया भी नहीं है । 'मूर्तिः' इत्यादि सन्दर्भ से इसी का विवरण दिया गया है । इस भाष्य-ग्रन्थ का अर्थ स्पष्ट है । 'सविग्रहे' इत्यादि सन्दर्भ से मन में जो कर्म उत्पन्न होता है, उसका कारण दिख- लाया गया है । जागते हुए पुरुष के 'सविग्रहे मनसि' अर्थात् शरीर सम्बन्ध से युक्त मन में "इन्द्रियान्तरसम्बन्धार्थं कर्म, आत्ममनःसंयोगादिच्छाद्वेषपूर्वकप्रयत्नापेक्षात्" अर्थात् इच्छा या द्वेष से उत्पन्न प्रयत्न ही जागते हुए पुरुष के मन में क्रिया का कारण हैं । यह कैसे समझा ? इसी प्रश्न का उत्तर "अन्यभिप्रायमिन्द्रियान्तरेण विषयोपलब्धिदर्श- नात्" इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् जाग्रत् अवस्था में इच्छा के अनुसार ही 'इन्द्रियान्तरेण' अर्थात् चक्षुरादि इन्द्रियों से विषयों की उपलब्धि देखी