वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 706, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सामान्यपदार्थनिरूपणम् प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यं द्विविधम्-परमपरं च। स्वविषयसर्वगत- 'पर' और 'अपर' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वह अपने विषयों (आश्रयों) में रहता है । वह अभिन्न स्वभाव का है । एक, दो या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है अपने एक न्यायकन्दली च प्रक्षोभणं चलनम्, परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति । हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् । कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः ॥ मणियों का चोर की ओर जाना एवं "अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणम्" अर्थात् साधारण लौह का चुम्बक की ओर जाना, ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं । सुख और उसके उपाय की प्राप्ति एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार, ये दोनों ही क्रिया से होते हैं, अतः इस क्रियातत्त्व को यल से हृदय में धारण करना चाहिए । ॥ भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ॥ न्यायकन्दली जयन्ति जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहति-हेतवः । विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥ सामान्यं व्याचष्टे-द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यान- मेतदुद्देशावसरे । सर्वसर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाह- स्वविषयसर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः , जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु महेश्वर, विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो । 'द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण- करते हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में (पृ. २९ पं. ११) कर चुके हैं । किसी सम्प्रदाय का मत है कि 'सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं' इस मत के खण्डन के लिए ही 'स्वविषयसर्वगतम्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की